स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय | Swami Vivekananda Biography

हम आपको अपने आज के इस आर्टिकल में स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय, सिद्धांत, कार्य, सभी उद्देश्य और उनके संबंधित सभी ज्ञान आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे। जो कि आपके ज्ञान की दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण होगी।

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स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय | स्वामी विवेकानंद का जीवन दर्शन | Swami Vivekanand Ka Jivan Parichay | Swami Vivekananda Biography in Hindi

Swami Vivekanand एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी जीवनी अर्थात जिनके जीवन परिचय और उनसे जुड़ी सभी प्रकार की जानकारी हम सभी के पास होनी चाहिए। क्योंकि ऐसे महान व्यक्ति के बारे में जब हम अध्ययन करते हैं, तो हमें ऐसी कई सारी बातें जानने को मिलती है, जिसे अगर हम अपने जीवन में अपना लें तो सदैव ही सही मार्गदर्शन पर चलने लगेंगे। उनके सिद्धांतों और उनके विचारों को अगर हम अपने जीवन में अपनाते हैं, तो हम अपने जीवन में आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर पाएंगे, और एक सही मार्गदर्शन पर चल पाएंगे।

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय में उनके सभी सिद्धांत और उनके कार्य बहुत ही कुशल थे। स्वामी विवेकानंद धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे। उनकी धर्म के तरफ बहुत रुचि थी। स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में धर्म के महत्वों को समझाया है। और सामाजिक सेवा को धर्म का हिस्सा माना है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि धर्म के क्षेत्र बहुत बड़े हैं। हमें अगर एक अच्छा और धार्मिक व्यक्ति बना है तो, हमें सभी प्रकार के भेदभाव से मुक्त होकर सच्चे मन से सभी व्यक्तियों को एक समान समझना चाहिए।

और समाज की और समाज के सभी लोगों की सहायता करनी चाहिए। समाज में कई जगहों पर नारी शिक्षा को अनदेखा किया जाता है। जो कि एक सफल और सकारात्मक समाज की निशानी बिल्कुल नहीं है। अगर हम एक सफल और सकारात्मक समाज की कल्पना कर रहे है। तो हुमें मिलकर संघर्ष करना होगा और नारी शिक्षा पर बल देना होगा।

स्वामी विवेकानंद ने धर्म का अर्थ बताते हुए कहा है कि धर्म का अर्थ ही है दूसरों की सेवा करना। हमारा धर्म हमें भेदभाव करना नहीं सिखाता है, बल्कि हमारा धर्म सदैव अस्पृश्यता का अंत कर सभी को एक समान समझना सभी की सेवा और आदर करना सीखना है। स्वामी विवेकानंद बताते हैं कि हम धर्म और योग के माध्यम से किस प्रकार धर्म करके और योग करके अपनी मानसिकता को सुधार सकते हैं। क्योंकि स्वामी विवेकानंद अपने पूरे जीवन में भारतीय संस्कृति और धर्म के बारे में बताते हैं, और प्रचार प्रसार करते हैं। स्वामी विवेकानंद ने धर्म संबंधी विचारों को पश्चिमी विश्व में भी अपने भाषणों के माध्यम से समझाने का प्रयत्न किया है।

स्वामी विवेकानंद का संक्षिप्त जीवन परिचय

नामस्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda)
उपनाम (बचपन का नाम)नरेंद्र नाथ दत्त
जन्म12 जनवरी 1863
जन्म स्थानकोलकाता (पश्चिम बंगाल)
पिताविश्वनाथ दत्त
माताभुवनेश्वरी देवी
भाई बहन9
जातिकायस्थ
दादादुर्गा चरण दत्त
गुरुरामकृष्ण परमहंस
शिक्षाB.A ग्रेजुएशन 1884
वैवाहिक स्थितिनहीं
संस्थापकरामकृष्ण मठ / रामकृष्ण मिशन
साहित्यक कार्यराज योग, कर्म योग, भक्ति योग, मेरे गुरु, अल्मोड़ा से किलंबु तक की व्याख्या
महत्वपूर्ण कार्यन्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी की स्थापना, कैलिफोर्निया में शांति आश्रम, और भारत के अल्मोड़ा के पास अद्वैत आश्रम की स्थापना
मृत्यु8 जुलाई 1902
मृत्यु स्थानबेलूर (पश्चिम बंगाल, भारत)
कथनउठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
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स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन | Swami Vivekanand Ka Prarambhik Jivan

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

[स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय]: स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन की बातें काफी रोचक हैं। स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त चाहते थे कि स्वामी विवेकानंद पश्चिमी सभ्यता को अपनाए। गोस्वामी विवेकानंद को अंग्रेजी भाषा का ज्ञान प्राप्त करवा कर पश्चिमी सभ्यता के राह पर चलना चाहते थे। परंतु स्वामी विवेकानंद की माता बहुत ही धार्मिक विचारों वाली महिला थी। उनके घर में सदैव भक्ति का वातावरण हुआ करता था। स्वामी विवेकानंद की माता प्रायः उन्हें रामायण भागवत जैसे पाठ पढ़कर उन्हें सुनाया करती थी। जिसके कारण स्वामी विवेकानंद की रुचि भारतीय संस्कृति और धर्म की तरफ बढ़ गई।

स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन बहुत ही प्रेरणादायक रहा है क्योंकि वह बचपन से ही बहुत कुशाग्र जीवन के थे। उनकी ईश्वर की प्रति आस्था और धर्म के प्रति उनका लगाओ उनके प्रारंभिक जीवन से ही देखने को मिलता है। इन्हें इनके माता-पिता से प्राप्त धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कार और धार्मिक विचारों के कारण नरेंद्र नाथ (स्वामी विवेकानंद) को बचपन से ही ईश्वर को प्राप्त करने की लालसा जगने लगी थी। वह बचपन से ही धर्म और ईश्वर पर अपनी आस्था को मजबूत कर लिए थे।

नरेंद्र के माता-पिता कभी-कभी उनके प्रश्नों से अचंभित हो जाया करते थे, क्योंकि यह अपनी आयु के अनुसार प्रश्न ना पूछ कर कभी गंभीर और उच्च प्रकार के प्रश्न किया करते थे। जिससे सभी अचंभित हो जाते थे कि इतनी कम उम्र के बालक के मन में ये सारे प्रश्न आखिरकार कैसे आते हैं। लेकिन नरेंद्र बचपन से ही काफी कुशाग्र (तीव्र) बुद्धि वाले बालक थे। और वह अपने ध्यान में ईश्वर से बात किया करते थे। ऐसा भी कहा जाता है।

स्वामी विवेकानंद का जन्म | Swami Vivekanand Ka Janm

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 ई को मकर संक्रांति के शुभ अवसर को कोलकाता में हुआ था। स्वामी विवेकानंद का जन्म कायस्थ जाति में हुआ था। जिस की उच्च जाति की श्रेणी में रखा गया है। स्वामी विवेकानंद के पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था। जो की काफी पढ़े लिखे व्यक्ति थे। स्वामी विवेकानंद के पिता कोलकाता के उच्च न्यायालय में वकालत करते थे। अर्थात वकील थे।

स्वामी विवेकानंद की माता का नाम श्रीमती भुवनेश्वरी देवी था। स्वामी विवेकानंद की माताजी बहुत ही धार्मिक विचारों वाली महिला थी। उनका ज्यादातर समय धर्म कर्म पूजा पाठ भक्ति इन्हीं सब में व्यतीत होता था। स्वामी विवेकानंद की मां शंकर भगवान की बहुत बड़ी उपासक थी। वह अपना सारा समय शंकर भगवान की भक्ति में व्यतीत करती थी।

स्वामी विवेकानंद के दादाजी का नाम दुर्गा चरण दत्त था। स्वामी विवेकानंद के दादाजी यानी दुर्गा चरण दत्त जी संस्कृत और फारसी भाषा के बहुत बड़े ज्ञाता अर्थात विद्वान थे। दुर्गा चरण दत्त ने 25 वर्ष की ही आयु में अपने घर और परिवार का त्याग कर दिया था। और साध्विक (साधु) जीवन को अपना लिया था।

स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम अर्थात उनका वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। नरेंद्र नाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद) अपने बचपन में बहुत ही चंचल और शरारती हुआ करते थे। स्वामी विवेकानंद तीव्र बुद्धि के थे, और स्वभाव से नटखट भी थे। वह अपने मित्रों के साथ मिलकर बहुत शरारत किया करते थे।

स्वामी विवेकानंद की शिक्षा | Swami Vivekanand Ka Siksha

[स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय]: स्वामी विवेकानंद (नरेंद्रनाथ दत्त) ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा 1871 ई० में प्रारंभ की थी। स्वामी विवेकानंद ने 8 वर्ष की उम्र में ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन संस्थान में नामांकन करवाया था। जिसे वर्तमान में विद्यासागर विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है जो कि उत्तरी कोलकाता में है।

1877 ईस्वी में नरेंद्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद) के परिवार को किसी कारणवश कोलकाता छोड़कर रायपुर जाना पड़ गया था। जिस कारण उनकी स्कूली पढ़ाई में तीसरी कक्षा के बाद बाधा आ गई थी। फिर पुणे स्वामी विवेकानंद एक वर्ष बाद 1879 ई० में अपने परिवार के साथ रायपुर से कोलकाता वापस आ गए। और वापस आने के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज की एंट्रेंस परीक्षा में प्रथम स्थान लाने वाले व्यक्ति बने।

स्वामी विवेकानंद को शिक्षा के क्षेत्र के साथ-साथ ग्रंथो में भी बहुत रुचि थी। स्वामी विवेकानंद को कला दर्शन साहित्य और धर्म के साथ-साथ सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में भी बहुत रुचि थी। स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में वेद उपनिषदों भागवत गीता, रामायण, महाभारत, पुराण और अन्य हिंदू ग्रंथो का गहरा अध्ययन किया है। उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ अपने धर्म के प्रति भी बहुत रुचि थी। स्वामी विवेकानंद जी भारतीय संगीत में भी बहुत निपुण थे।

स्वामी विवेकानंद हमेशा बढ़-चढ़कर शारीरिक योग और खेलकूद में भाग लेते थे। स्वामी विवेकानंद सभी युवाओं के लिए प्रेरणादायक थे। वह अपनी दृष्टिकोण को हर युवाओं में देखना चाहते थे। वह चाहते थे कि आज की युवा अपनी भारतीय संस्कृतियों को समझें और अपने धर्म और वेदों के प्रति अपनी रुचि को बढ़ाएं। स्वामी विवेकानंद ने 1881 ई० में अपनी ललित कला की परीक्षा पूरी की। स्वामी विवेकानंद ने अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री कला विषय में पूरी की थी। 1884 ई० मैं स्वामी विवेकानंद के पिता की मृत्यु हो गई और उनसे उनके पिता का साथ सदैव के लिए छूट गया।

स्वामी विवेकानंद के पिता की मृत्यु के बाद स्वामी विवेकानंद के नौ भाई बहनों की जिम्मेदारी उन पर आ गई। परंतु स्वामी विवेकानंद अपनी जिम्मेदारियां से घबराएं नहीं उन्हें अपने सभी भाई बहनों के प्रति अपने जिम्मेदारियां को बखूबी निभाया, और उन्हें बहुत अच्छे संस्कार भी दिए।

स्वामी विवेकानंद ने पश्चिम दर्शन और यूरोपीय इतिहास का विस्तार पूर्वक अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन से किया था। जिसे वर्तमान में स्कॉटिश चर्च कॉलेज के नाम से जाना जाता है। वे भारतीय संस्कृति के साथ-साथ पश्चिमी इतिहास का भी विस्तार पूर्वक अध्ययन किए थे। स्वामी विवेकानंद को बंगाली भाषा का भी ज्ञान प्राप्त था। स्वामी विवेकानंद जी हर्बर्ट स्पेंसर की किताब से काफी ज्यादा प्रभावित हुआ करते थे।

स्वामी विवेकानंद के गुरु | Swami Vivekanand Ke Guru Kaun The

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

स्वामी विवेकानंद बचपन से ही बहुत कुशल बुद्धि के थे। वे सभी आम बालको से अलग थे। उन्हें बचपन से ही अपने धर्म के प्रति बहुत अधिक रुचि थी। उनके अंदर बचपन से ही ईश्वर के बारे में जानने की जिज्ञासा थी। इसलिए एक बार स्वामी विवेकानंद जी ने महर्षि देवेंद्र नाथ से प्रश्न पूछ लिया (कि क्या आपने ईश्वर को देखा है?)

महर्षि देवेंद्र नाथ स्वामी विवेकानंद के इस प्रश्न से अचंभित हो गए, और उन्हें ज्ञात हो गया कि यह बालक बहुत ही तीव्र अर्थात कुशाग्र बुद्धि का बालक है। इसलिए महा ऋषि देवेंद्रनाथ ने स्वामी विवेकानंद को स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास जाने का सलाह दिया, और कहा तुम्हें तुम्हारे हर प्रश्नों का उत्तर स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास से मिल जाएगा।

महर्षि देवेंद्र नाथ की सलाह को मानकर स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस के साथ 1880-81 ई० में मुलाकात की और उनसे यह प्रश्न पूछा कि (स्वामी क्या आपने ईश्वर को देखा है?) तो उनके इस प्रश्न को सुनते ही स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा आप वही बालक हो जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी। फिर स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा हां मैं ईश्वर को देखा है। मैं अभी भी आपके अंदर भी ईश्वर को देख रहा हूं। भगवान हर किसी के अंदर स्थापित हैं। बस जरूरत है तो हमें सच्चे और शुद्ध मन से अपने अंतरात्मा में देखने की, और भगवान को सच्चे मन से महसूस करने की।

स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस की इस जवाब से संतुष्ट हो गए। इस तरह से उनका झुकाव रामकृष्ण परमहंस की तरफ बढ़ने लगा और इस प्रकार स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के मुख्य शिष्य बन गए। और स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु मान लिया, और यहां से ही उन्हें वेद वेदांत का आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ, और स्वामी रामकृष्ण परमहंस के विचारधारा के समान ही विचारधारा स्वामी विवेकानंद में स्थानांतरित हो जाती है।

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स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस

रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी 19 1836 ई को पश्चिम बंगाल के कमारपुकुर नामक गांव के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। रामकृष्ण परमहंस के पिता का नाम खुदीराम और उनकी मां का नाम चंद्रमणि देवी था। रामकृष्ण परमहंस एक महान संत थे। उन्हें आज भी करोड़ों लोग अपने आदर्श के रूप में मानते हैं।

रामकृष्ण परमहंस की बातों का कोलकाता के सभी बुद्धिजीवियों पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा। रामकृष्ण परमहंस कोलकाता के दक्षिणेश्वर के मां काली के मंदिर के बहुत बड़े पुजारी हुआ करते थे। ऐसा माना या कहा जाता है, कि रामकृष्ण परमहंस को मां का आशीर्वाद प्राप्त था, क्योंकि वह प्रतिदिन मन से बात किया करते थे बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार दो आम लोग आपस में बात करते हैं। इसलिए ऐसा कहा जाता था रामकृष्ण परमहंस और भगवान के मध्य एक गहरा रिश्ता है।

रामकृष्ण परमहंस छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से शिक्षा दिया करते थे। हालांकि यह बात सत्य है कि रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाएं आधुनिकता और राष्ट्र के आजादी में न होकर देश में राष्ट्रवाद की भावनाओं को बढ़ाना और धार्मिक पक्षपात को और अस्वीकार ना था। रामकृष्ण परमहंस कहां करते थे मनुष्य का सबसे बड़ा लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है। रामकृष्ण परमहंस प्राय सभी को यह शिक्षा दिया करते थे, कि यदि आप अपने अंदर से अहंकार को दूर करना चाहते हो तो अपने अंदर से हम भाव को सदैव के लिए ही दूर करना होगा। रामकृष्ण परमहंस के अनुसार संसार एक माया है और माया हमें हमेशा विद्या और ज्ञान से दूर कर देता है।

इसलिए मानव को सदैव इस संसार रूपी माया उदाहरण के लिए काम लोग लालच कर्म स्वार्थी कुरूरता आदि इन सभी से दूर रहना चाहिए। क्योंकि जो भी व्यक्ति अपने अंदर इन सभी चीजों का समावेशन किए रहते हैं। वह कभी भी धर्म और ईश्वर को नहीं समझ पाता है। इसलिए मनुष्य को कभी भी ना तो अपने अंदर अहंकार को जन्म देना चाहिए, और ना ही स्वार्थ की भावना को उपज होने देना चाहिए। एक शुद्ध व्यक्ति वही होता है जो अपने जीवन के लक्ष्य को समझता है और वह सारे मोह और मार्ग कोर्टयार्ड देता है, जो उसे उसके लक्ष्य को पाने में बाधा बन रही हो।

रामकृष्ण परमहंस की इन सभी शिक्षाओं के कारण स्वामी विवेकानंद का झुकाव रामकृष्ण परमहंस के तरफ बढ़ गया और वे रामकृष्ण परमहंस के मुख्य शिष्य बन गए। जब रामकृष्ण परमहंस अपने जीवन के अंतिम दिनों में समाधि में रहने लगे, तो उनकी शारीरिक हालत ठीक नहीं रहने लगी। इलाज के दौरान चिकित्सक ने उन्हें कैंसर की भयानक बीमारी से ग्रसित बता दिया, और उन्हें समाधि लेने से मना कर दिया।

स्वामी विवेकानंद भी हमेशा से ही सामाजिक सेवाओं को अपना प्रथम कर्तव्य मानते थे इसलिए स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस से हिमालय के किसी एकांत स्थल पर जाकर तपस्या करने की मांग की। तभी रामकृष्ण परमहंस ने गरीबों की सेवा के लिए विवेकानंद को प्रेरित करते हुए कहा कि मेरे शिष्य जैसा कि तुम्हें बखूबी ज्ञात है, कि हमारे आसपास के क्षेत्र में चारों तरफ आज्ञा का अंधेरा छाया हुआ है, और यहां चारों तरफ लोग भूख प्यास से चिल्लाते रहते हैं, और इन अवस्था में तुम्हारा हिमालय की गुफा में समाधि के लिए आनंद में निमग्न होना क्या यह संभव हो पाएगा। क्या तुम्हारी आत्मा यह स्वीकार कर पाएगी?

इस प्रकार रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को गरीबों के सेवा के लिए प्रेरित किया, और उनकी इस शिक्षा से स्वामी विवेकानंद बहुत प्रेरित हुए। अपने गुरु की प्रेरणा से प्रेरित होकर स्वामी विवेकानंद दरिद्र नारायण की सेवा में लग गए। चिकित्सा के बावजूद भी रामकृष्ण परमहंस के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ और फिर सन 1886 ई० में श्रावणी पूर्णिमा के अगले दिन प्रतिपाद के प्रतिकाल में ही स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने अपना देश त्याग दिया।

स्वामी विवेकानंद का भारत भ्रमण

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

[स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय]: स्वामी विवेकानंद 16 अगस्त 1886 को अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के पश्चात कुछ दिनों तक एकांत स्थान में जाकर समाधि में रहने का निर्णय किया। एकांतवास में समाधि में रहने के बाद स्वामी विवेकानंद गरीबों की सेवा के उद्देश्य से भारत भ्रमण पर निकले। यह यात्रा उन्हें पैदल ही तय करने का तय किया था। भारत भ्रमण की पैदल यात्रा में वह कई सारे स्थान पर गए। उन्होंने बनारस, अयोध्या, प्रयागराज, आगरा, वृंदावन और अन्य स्थानों पर भी भ्रमण किया था।

भारत भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद कई सारे ब्राह्मण राजाओं तथा गरीबों के घरों में निवास किया, और इसी दौरान स्वामी विवेकानंद ने जातिवाद और लोगों के बीच बढ़ते भेदभाव का अनुभव किया, और इस यात्रा के दौरान उन्हें ज्ञात हुआ कि भारत के अधिकार क्षेत्र में जातिवाद और भेदभाव की भावना अब भी जीवित है। इसलिए उन्होंने जातिवाद और भेदभाव की इस भावना को समाप्त करने के लिए अनेक कार्यों के माध्यम से प्रयास किया। भारत भ्रमण के दौरान हुआ 23 दिसंबर 1992 को वह भारत के अंतिम छोर कन्याकुमारी पहुंचे और वह कन्याकुमारी में तीन दिन तक समाधि में रहे। भ्रमण दौरान उनकी मुलाकात राजस्थान के आबूरोड में अपने गुरु भाइयों स्वामी ब्रह्मानंद से हुई।

भारत भ्रमण की इस पैदल यात्रा में स्वामी विवेकानंद अनेक स्थान पर गए, और उन्होंने इस यात्रा में कई सारे निस्सहाय गरीब और पीड़ित लोगों को देखा, और फिर स्वामी विवेकानंद ने तय किया वह केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में सभी को जीवन का सही अर्थ समझाएंगे, और लोगों को एक दूसरे के प्रति सोने और देखने के तरीकों में परिवर्तन लाएंगे। स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में समूचे विश्व में अपने गुरु की शिक्षा और अपने दृष्टिकोण से लोगों को जागरूक किया, और समाज सेवा के लिए प्रेरित किया था।

स्वामी विवेकानंद का विश्व भ्रमण | Swami Vivekanand Ka Vishwa Bhraman

स्वामी विवेकानंद बड़े ही दयालु प्रवृत्ति वाले व्यक्ति थे। उन्होंने विश्व भ्रमण की यात्रा भारत संस्कृति और सनातन धर्म के बारे में सभी को अवगत कराने के लिए आरंभ किया था। धर्म सम्मेलन खत्म होने के बाद स्वामी विवेकानंद तीन वर्षों तक अमेरिका में ही रुके और हिंदू धर्म के वेदांग और भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का प्रचार अलग-अलग जगह पर जाकर किया।

स्वामी विवेकानंद को अमेरिका के प्रेस ने ” Cyclonic Monk of India ” का नाम दिया था।

स्वामी विवेकानंद ने 1894 ई० में न्यूयॉर्क में वेदांग समिति की स्थापना की। 1896 ई० में स्वामी विवेकानंद की मुलाकात मैक्स मूलर से हुई, जो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे। जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की आत्मकथा लिखी थी। और फिर स्वामी विवेकानंद 1897 ई० में श्रीलंका चले गए। जहां उनका स्वागत दिल खोलकर किया गया। उसे समय स्वामी विवेकानंद काफी प्रचलित थे। और स्वामी विवेकानंद श्रीलंका से रामेश्वरम चले गए और फिर 1897 में वह रामेश्वरम से अपने घर कोलकाता वापस लौट गए। स्वामी विवेकानंद की विश्व भरमन की यात्रा इसी प्रकार थी।

स्वामी विवेकानंद की शिकागो अमेरिका यात्रा

स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति और धर्म के प्रचार प्रसार के लिए 31 में 1893 को अपनी यात्रा तय की थी। इस यात्रा में हुए कई सारे देश में गए। कई सारे देशों के शहरों में गए और इसी दौरान वह भ्रमण करते हुए शिकागो पहुंचे। 11 सितंबर 1893 ई० को शिकागो अमेरिका में विश्व धर्म सम्मेलन का आयोजन किया था।

जहां विवेकानंद भारत की तरफ से भारतीय संस्कृति और अपने धर्म के बारे में बताने के लिए एक प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे थे। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो अमेरिका में स्वागत विश्व धर्म सम्मेलन में मिले कुछ ही समयों में ऐसा भाषण दिया। जिससे स्वामी जी की बोलने की कोई समय सीमा ही नहीं रही। विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद जी की भाषण से कई लोग बहुत प्रेरित भी हुए थे।

स्वामी विवेकानंद अमेरिका के विश्व सम्मेलन का भाषण

11 सितंबर 1893 को शिकागो अमेरिका में विश्व धर्म सम्मेलन का आयोजन किया गया था। जिसमें स्वामी विवेकानंद भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे थे। शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में कई सारे लोग आए थे जिसमें अलग-अलग देशों से भी विचारक आए हुए थे। शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में सारे विचारक ने भाषण दिया। और स्वामी विवेकानंद को विश्व के सर्व धर्म परिषद में बोलने का बहुत कम समय दिया गया था।

परंतु स्वामी विवेकानंद के द्वारा अपने भाषण के संबोधन में जब ऐसा कहा “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों”इस संबोधन ने सम्मेलन में बैठे सभी विद्वानों पर गहरा प्रभाव डाला। जिससे कि स्वामी विवेकानंद की बोलने की कोई समय सीमा नहीं रही। स्वामी विवेकानंद के भाषण ने आर्ट इंस्टीट्यूट आफ शिकागो मैं तालिया की गूंज उठा दी। सम्मेलन में पूरे 2 मिनट तक तालिया की गूंज गूंजती रही। स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण के माध्यम से भारत को विश्व गुरु के रूप में परिचित कराया था। और कहा “मैं ऐसे देश से हूं जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्म के सताए लोगों को जगह दी है।”परिषद में उपस्थित सभी विद्वान उनके विचारों को सुनकर अचंभित हो गए थे।

इसके पश्चात स्वामी विवेकानंद का अमेरिका में एक भव्य स्वागत किया गया। स्वामी विवेकानंद की उच्च विचारों को सुनकर वहां उनके अनेक भक्त बन गए। स्वामी विवेकानंद पूरे 3 वर्षों तक अमेरिका में ही रहे, और वहां के लोगों को भारतीय संस्कृति का तत्व ज्ञान की ज्योति से अवगत कराया। उनके विचार और उनके ज्ञान को देखते हुए वहां की मीडिया ने उन्हें cylonic hindu का नाम दिया। स्वामी विवेकानंद का अध्यात्म विद्या और भारतीय दर्शन पर दृढ़ विश्वास था। स्वामी विवेकानंद ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण, न्यूयॉर्क में वेदांत समिति की स्थापना, इसके अलावे पेरिस, ऑक्सफोर्ड, लंदन में भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का प्रचार प्रसार किया।

Note:- विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने वाले सभी देशों ने अपना धार्मिक किताब रखा था, तो वही भारत की ओर से भागवत गीता रखा गया था।

रामकृष्ण मठ की स्थापना | Ramkrishna Mission Ki Sthapna

स्वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897 ई को कोलकाता में रामकृष्ण मठ की स्थापना की थी। रामकृष्ण मठ की स्थापना करने का स्वामी विवेकानंद का उद्देश्य नवभारत का निर्माण करना और अनेक अस्पताल स्कूल और कॉलेज की स्थापना करना था। रामकृष्ण मठ को बाद में रामकृष्ण मिशन का नाम दे दिया गया।

स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना समाज की सहायता के उद्देश्य किया था। स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना के बाद 1898 ई० में बेलूर मठ (Belur Math) की भी स्थापना की थी। इसके अलावे भी स्वामी विवेकानंद ने अन्य और दो मठों की भी स्थापना की थी। नरेंद्र नाथ ने रामकृष्ण मठ की स्थापना के पश्चात ब्रह्मचर्य वस्त्र धारण किया और फिर वह नरेंद्रनाथ दत्त से स्वामी विवेकानंद बन गए।

स्वामी विवेकानंद का दूसरा विश्व यात्रा

स्वामी विवेकानंद 20 जून 1899 को फिर एक बार अमेरिका गए, और वहां जाने के बाद उन्होंने अमेरिका के कैलिफोर्निया में शांति आश्रम का निर्माण किया था। और फ्रांसिस्को और न्यूयॉर्क में स्वामी विवेकानंद ने वेदांत सोसाइटी की स्थापना की।

फिर जुलाई 1980 में स्वामी विवेकानंद जी पेरिस गए। स्वामी विवेकानंद ने पेरिस में कांग्रेस ऑफ द हिस्ट्री रिलेशंस में भाग लिया, और वह करीब 3 महीने तक पेरिस में ही रुके थे। इसी दौरान स्वामी विवेकानंद के दो शिष्य भी बने थे।

  1. भगिनी निवेदिता
  2. स्वामी त्रियानंद

1900 ई की आखिरी माह तक स्वामी विवेकानंद जी भारत लौट गए।

स्वामी विवेकानंद के कार्य

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में बहुत से ऐसे महत्वपूर्ण कार्य किए हैं, जिसे आज भी उनका नाम पूरे देश भर में जाना जाता है। स्वामी विवेकानंद के योगदान और उनके सिद्धांत और उनके कार्यों के कारण आज की युवा उन्हें अपनी प्रेरणा मानते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन के बहुत कम ही उम्र में वह कर दिखाया जो किसी और व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। स्वामी विवेकानंद ने 1886 ई० में रामकृष्ण मठ की स्थापना की वेदांत समाज की नींव रखी और इसके अलावे 1893 में शिकागो अमेरिका में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया और न केवल भाग लिया बल्कि अमेरिका में भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म से सबको परिचित कराया।

उनके इस कार्य से न केवल भारतीय युवाओं को प्रेरणा मिली बल्कि विदेशों में भी कई लोगों स्वामी विवेकानंद के विचार से प्रेरित हुए। और उनके भाषण ने विश्व धर्म सम्मेलन में उपस्थित सभी विद्वानों को अचंभित भी किया। स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति की गौरव को और बढ़ा दिया था। स्वामी विवेकानंद को सभी लोगों में हिंदुत्व की भावना को जागृत करने और राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करने के लिए भी जाना जाता है। [स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय]

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

स्वामी विवेकानंद के सामाजिक कार्य

अपने जीवन काल में स्वामी विवेकानंद ने सामाजिक कार्यों में कई योगदान दिया है स्वामी विवेकानंद के सामाजिक कार्यों के योगदान को कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है।

  • भारत के प्रति योगदान
  • हिंदुत्व के प्रति योगदान
  • वैश्विक संस्कृति के प्रति योगदान

भारत के प्रति योगदान

अपने जीवन काल में स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति के जुड़ाव को संपन्न करने का पूरा प्रयास किया था। स्वामी विवेकानंद के भारत में संस्कृति के जुड़ाव को संपन्न करने के इस कार्य को प्रसंसनीय माना जाता है।

स्वामी विवेकानंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारत साहित्य को समृद्ध बनाने का प्रयास किया है। जिससे भारत के प्राचीन और धार्मिक रचनाओं का विवेचन संभव हुआ है। स्वामी विवेकानंद अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों के अंदर धार्मिक आस्था का बीच रोपण भी किया है। स्वामी विवेकानंद की रचनाओं ने लोगों को धार्मिक होने के लिए बहुत प्रेरित किया है। यही नहीं बल्कि स्वामी विवेकानंद ने देश में जातिवाद और छुआछूत को समाप्त करने के लिए भी हर संभव प्रयास किया है।

हिंदुत्व के प्रति योगदान

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन काल में हिंदुत्व के लिए भी बहुत से कार्य किए हैं। स्वामी विवेकानंद के इन ही सभी योगदान के लिए आज भी वह सभी के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। स्वामी विवेकानंद ने भारतीय समाज में प्राचीन धार्मिक परंपराओं को स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। जिसके माध्यम से हिंदुत्व के धार्मिक सिद्धांत को एक नई दिशा प्रदान हुई है। स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन काल में विश्व भरमन की यात्रा के दौरान हिंदुत्व की महानता एवं सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है जिसका परिणाम आज हमें देखने को भी मिलता है। आज संपूर्ण विश्व में हिंदुत्व को सदैव सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

वैश्विक संस्कृति के प्रति योगदान

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन काल में वैश्विक संस्कृति की नई विचारधारा को विकसित करने का प्रयास किया है। जिससे लोगों में वैश्विक संस्कृति के प्रति आचरण के नए सिद्धांत स्थापित हुए। स्वामी विवेकानंद ने सभी व्यक्तियों को एक दूसरे के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की प्रेरणा दी है। जिससे कि पूरे विश्व में शांति कायम रह सके।

स्वामी विवेकानंद की विचारधारा

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन काल में अपने विचारों को बहुत अच्छे से स्पष्ट कर है।स्वामी विवेकानंद के विचार न केवल उच्च श्रेणी के थे बल्कि यह लोगों को अपने जीवन में उतरने के लिए प्रेरित भी करते थे। तो हम आपको इस आर्टिकल में स्वामी विवेकानंद की दो प्रकार के विचारों को आपके साथ साझा करेंगे।

स्वामी विवेकानंद के सामाजिक विचार

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन काल में भारत के नवनिर्माण और पुनर्जागरण के लिए सामाजिक सुधार कार्यों को बहुत महत्व दिया है। स्वामी विवेकानंद ने समाज में हो रहे इस भेदभाव, जातिवाद छुआछूत वह निंदा की भावना को भारतीय समाज के लिए अभिशाप माना है। स्वामी विवेकानंद ने इन सभी सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना की है। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि इन सामाजिक बुराइयां और इस सामाजिक दुर्बलताओं के कारण भारत का धीरे-धीरे पतन हो रहा है। स्वामी विवेकानंद ने भारतीय समाज से इन सामाजिक बुराइयों के समापन के लिए बहुत से प्रयास किए। जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं।

  • समाज की साव्यवी रूप
  • कर्म और कर्तव्य का संदेश
  • मूर्ति पूजा
  • अस्पृश्यता की निंदा
  • सामाजिक प्रगति वाले विचार

समाज का साव्यवी रूप

स्वामी विवेकानंद साव्यवी समाज की कल्पना करते हैं, और बताते हैं। साव्यवी समाज की रचना व्यक्तियों के समूह के संपूर्ण होने से संभव है। जिससे एक नए समाज की रचना होती है। स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं सामाजिक प्रगति केवल तभी संभव है जब व्यक्तियों के द्वारा त्याग किया बलिदान दिया जाए।

कर्म और कर्तव्य का संदेश

स्वामी विवेकानंद एक कर्मवादी व्यक्ति थे। स्वामी विवेकानंद के अनुसार अपने कर्म और कर्तव्यों का पालन करना ही वेदांत का सर माना गया है। स्वामी विवेकानंद सदा अपने कर्म और कर्तव्यों का पालन किया करते थे। स्वामी विवेकानंद अपने सिद्धांतों में अपनी विचारधाराओं में सदा मानव कल्याण की कामना करते थे। स्वामी विवेकानंद सभी को हमेशा यही प्रेरणा देते थे कि व्यक्ति को सदा दूसरे व्यक्ति के प्रति प्रेम प्यार की भावना रखनी चाहिए। ना कि द्वेष और भेदभाव की, व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के प्रति प्रेम की भावना से ही विश्व में प्रेम का संचालन तेजी से होता है।

मूर्ति पूजा

स्वामी विवेकानंद अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के समान ही मूर्ति पूजा के बहुत बड़े समर्थक थे। स्वामी विवेकानंद मूर्ति पूजा को धर्म के प्रति हमारे आस्था के प्रतीक मानते थे। विवेकानंद के अनुसार मूर्ति पूजा के माध्यम से लोगों के अंदर ईश्वर के प्रति आस्था और भी गहरी होती है। जिससे लोगों को ईश्वर की प्राप्ति होती है।

अस्पृश्यता की निंदा

अस्पृश्यता की अर्थात छुआछूत की भावना स्वामी विवेकानंद ने अस्पृश्यता को सामाजिक बुराइयों का एक जटिल कारण माना है। स्वामी विवेकानंद के अनुसार अस्पृश्यता एक ऐसा अभिशाप है। जो लोगों के मन में दूसरे लोगों के प्रति गिरना का भाव उत्पन्न कर देती है। जिससे जनता का बंटवारा

सामाजिक प्रगति वाले विचार

स्वामी विवेकानंद कर्मवादी व्यक्ति के साथ ही व्यवहारिक विचारक भी थे। स्वामी विवेकानंद सदैव सामाजिक प्रगति वाले विचारक थे। स्वामी विवेकानंद का कहना था हमें विश्व में मौजूद सभी जीव जंतु और वस्तुओं के प्रति सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए। हमें उन्हें सकारात्मकता के साथ ग्रहण करना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद के राजनीतिक विचार

स्वामी विवेकानंद एक बहुत ही साधारण और संन्यासी व्यक्ति थे। इसलिए उनका राजनीति के प्रति कुछ खास लग नहीं देखा गया है। परंतु उनमें सदैव अपने देश अपने देश की संस्कृति और सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के प्रति गहरा लगा देखा गया है। स्वामी विवेकानंद किसी भी राजनीतिक आंदोलन में अपने दिलचस्पी नहीं दिखाते थे, परंतु वह एक शक्तिशाली और गतिशील राष्ट्र की कामना अवश्य करते थे। जिस प्रकार महात्मा गांधी राजनीति का आध्यात्मिक करण करना चाहते थे। इस प्रकार स्वामी विवेकानंद भी राजनीति का आध्यात्मिक कारण करना चाहते थे।

स्वामी विवेकानंद के 9 अनमोल वचन | Swami Vivekanand ke 9 Anmol Vachan

स्वामी विवेकानंद ने अपने ज्ञान में विचारधाराओं से विश्व को काफी प्रभावित किया है। स्वामी विवेकानंद के 9 अनमोल वचन है जो स्वामी विवेकानंद ने सभी देशवासियों और हर किसी के लिए एक प्रेरणा के रूप में कहा है।

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

जो इस प्रकार है

  • एक समय में एक ही कम करो और ऐसा करते समय सब कुछ भूल कर अपनी पूरी आत्मा उसे काम में डाल दो।
  • विश्व एक व्यायाम शाला है। जहां मनुष्य खुद को मजबूत बनाने के लिए कार्य करता है।
  • जहां शक्ति जीवन है, तो निर्मलता मृत्यु है। जहां प्रेम जीवन है, तो द्वेष मृत्यु है। जहां संकुचन मृत्यु है, तो बिस्तर जीवन है।
  • ईश्वर पर विश्वास करना है तो सर्वप्रथम स्वयं पर विश्वास करो।
  • मनुष्य जो बोलता है वही करता है। अर्थात मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं ही है।
  • मनुष्य का भारी स्वभाव वास्तविक रूप में आंतरिक स्वभाव का एक बड़ा रूप है।
  • मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक रूप से कमजोर बनाने वाले कारणों को मनुष्य को विष की भांति त्याग देना चाहिए।
  • नए विचारों का जन्म के लिए चिंतन करना उचित है, चिंता करना नहीं।
  • स्वामी विवेकानंद कहते हैं समाज में पहले हर अच्छी बात का मजाक बनाया जाता है, और उसका भरपूर विरोध भी किया जाता है, और बाद में उसे स्वीकार भी कर लिया जाता है।

स्वामी विवेकानंद के यह 9 अनमोल वचन सभी के लिए एक पर प्रेरणादायक साबित हुआ है।

स्वामी विवेकानंद के शैक्षिक विचार

[स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय]: स्वामी विवेकानंद के शिक्षा के प्रति बहुत ही उच्च विचार थे। स्वामी विवेकानंद शिक्षा को आशीर्वाद तथा मानवतावाद का दर्शन मानते थे। स्वामी विवेकानंद के अनुसार मनुष्य को शिक्षित होना बहुत ही आवश्यक है। शिक्षा से उनका अभिप्राय केवल किताबी ज्ञान नहीं था। स्वामी विवेकानंद का शिक्षा से तात्पर्य व्यक्ति का शिक्षित होना था, ना केवल पढ़ाई के मामले में बल्कि धर्म कर्म व्यवहार बड़े बुजुर्गों का सम्मान अर्थात अपने अंदर मानवता के आदर्श को लाना है।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार व्यक्ति का शिक्षित होना उसके खुद पर निर्भर करता है। स्वामी विवेकानंद के अनुसार कोई भी व्यक्ति आपको तब तक शिक्षित नहीं बन सकता तब तक नहीं पढ़ा सकता जब तक आपके अंदर इन सभी चीजों को सीखने और अपने जीवन में अपने की लालसा न हो। स्वामी विवेकानंद ने समकालीन शिक्षा पद्धति के विरोध में इसकी आलोचना की थी, क्योंकि इस प्रकार की शिक्षा मानवतावादी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। स्वामी विवेकानंद एक मानवतावादी व्यक्ति थे। जिनके अनुसार शिक्षा मनुष्य के मस्तिष्क में विद्यमान ज्ञान को उजागर करने का कार्य करती है।

स्वामी विवेकानंद के शैक्षिक दर्शन के आधारभूत सिद्धांत

स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा कैसी होनी चाहिए इसके संदर्भ में अपनी विचारधारा के माध्यम से कुछ आवश्यक सिद्धांत दिए हैं। जो इस प्रकार है।

  • शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी भी व्यक्ति का न केवल रूप से विकास हो, बल्कि शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से भी विकास हो।
  • शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव नहीं होना चाहिए। लड़के और लड़कियां दोनों को समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। इसलिए लड़का हो या लड़की दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
  • शिक्षा ऐसी देनी चाहिए। जिससे सिखाने वाले को अपने जीवन की परेशानियां और चुनौतियों से सीखने की ताकत मिले, हौसला मिले।
  • देश की आर्थिक रूप से उन्नति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • सभी शिक्षण संस्थान में लौकिक तथा पारलौकिक दोनों विषयों को स्थान देना चाहिए।
  • सभी छात्रों का अपने शिक्षकों के साथ यथासंभव रिश्ता घनिष्ठ होना चाहिए।
  • शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो न केवल आपको आपके पाठ्य पुस्तक का ज्ञान दें बल्कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो आपको व्यावहारिक और धार्मिक ज्ञान भी अवश्य दे।
  • शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो मनुष्य में चरित्र का निर्माण कराए मन और बुद्धि का विकास कराए।
  • शिक्षा का सामान्य रूप से प्रचार एवं प्रसार करना चाहिए।
  • स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा केवल नाम का नहीं होना चाहिए शिक्षा का वास्तविक अर्थ है हमेशा किताबी ज्ञान के साथ-साथ धार्मिक ज्ञान और व्यवहारिक ज्ञान भी है।

स्वामी विवेकानंद के सिद्धांत | Swami Vivekanand ke Siddhant

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में तीन सिद्धांत दिए हैं।

  1. व्यक्ति को निर्भय होना चाहिए।
  2. व्यक्ति को आत्मविश्वासी होना चाहिए।
  3. अपने शब्दों पर विश्वास रखो।
  • स्वामी विवेकानंद अपने जीवन काल में सभी को यह प्रेरणा देते हैं, कि सभी व्यक्ति को अपना जीवन निर्भयता के साथ जीना चाहिए।
  • स्वामी विवेकानंद के अनुसार व्यक्ति को सदैव आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर होना चाहिए ताकि उसे अपने जीवन में कभी भी किसी पर आश्रित ना रहना पड़े।
  • स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में सभी को यह प्रेरणा दी है, कि व्यक्ति को सदैव अपने बोले हुए वचनों पर विश्वास होना चाहिए। मनुष्य को कभी भी सत्य का साथ देने और गलत चीजों के विरोध में बोलने से कभी भी नहीं चूकना चाहिए

स्वामी विवेकानंद अपनी पूरे जीवन में सभी व्यक्ति को प्रेरित करने के सिद्धांत देते है। लोगों को निर्भयता के साथ जीना आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देते है।

स्वामी विवेकानंद ने शादी क्यों नहीं की

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

स्वामी विवेकानंद के वैवाहिक जीवन की बात करें तो, स्वामी विवेकानंद ने शादी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। स्वामी विवेकानंद शादी और सांसारिक भोग से पड़े होकर समाज की सेवा करने को अपना उद्देश्य मान लिया था। इसलिए वह पारिवारिक मोह माया से परे रहना चाहते थे। स्वामी विवेकानंद अपने जीवन में शादी करके पारिवारिक जीवन में बांधने से ज्यादा वो समाज को सही मार्गदर्शन और सामाजिक सेवा करने में विश्वास करते थे।

स्वामी विवेकानंद के शादी न करने का एक और कारण उनके परिवार की आर्थिक स्थिति भी थी। स्वामी विवेकानंद के पिता श्री विश्वनाथ दत्त की मृत्यु के पश्चात उसके परिवार की आर्थिक स्थिति में गहरा प्रभाव पड़ा था। इसलिए स्वामी विवेकानंद ने शादी न करने के फैसले को उचित समझा। स्वामी विवेकानंद का यह मानना था मनुष्य अगर अपने जीवन में किसी भी लक्ष्य को पाना चाहता है, तो उसे तब तक अपने दांपत्य जीवन का त्याग करना चाहिए जब तक वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति ना कर ले।

स्वामी विवेकानंद जयंती | Swami Vivekanand Jayanti

स्वामी विवेकानंद की जयंती हमारे भारतवर्ष में प्रत्येक वर्ष 12 जनवरी को उनके जन्म दिवस पर पूरे धूमधाम से मनाई जाती है। स्वामी विवेकानंद की जयंती राष्ट्रीय युवा दिवस (National Youth Day) के रूप में मनाया जाता है।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कब हुई | Swami Vivekanand Ki Mrityu Kab Hui

स्वामी विवेकानंद का निधन 4 जुलाई 1902 ई० को महज 39 वर्ष की उम्र में तीसरी बार दिल का दौरा पड़ने से बेलूर मठ (बंगाल) मैं तकरीबन रात के 9 बजे हुआ था। स्वामी विवेकानंद ने अपनी मृत्यु के पहले बेलूर मठ में ही संध्या के समय तकरीबन 3 घंटे तक साधना की थी। और अपनी साधना के पश्चात स्वामी विवेकानंद रात के 7:00 बजे अपने कक्ष में प्रवेश किया और उसी दिन उनके कक्ष में प्रवेश करने के 2 घंटे पश्चात उनकी मृत्यु की खबर पूरे बेलूर मठ में फैल गई।

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की है। और कहां है कि “इस विवेकानंद ने अपने जीवन में जो किया है उसे समझाने के लिए एक और विवेकानंद की जरूरत है।” स्वामी विवेकानंद का अंतिम संस्कार बेलूर की उसी गंगा तट पर की गई। जिसके दूसरी ओर 16 वर्ष पूर्व उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का अंतिम संस्कार हुआ था।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु का कारण | Swami Vivekanand Ki Mrityu Kaise Hui

स्वामी विवेकानंद लगभग 31 से अधिक बीमारियों से ग्रसित थे। इन्हीं वजहों के कारण स्वामी विवेकानंद की निधन महज 39 वर्ष की उम्र में ही हो गई।

बंगाल के मशहूर लेखक शंकर अपनी पुस्तक “द मॉन्क एज मैन”, द अननोन लाइफ ऑफ, मैं स्वामी विवेकानंद के बारे में बताते है कि स्वामी विवेकानंद को यकृत, निद्रा, मलेरिया, मधुमेह, माइग्रेन, पित्त में पथरी, गुर्दे एवं हृदय संबंधित लगभग 31 बीमारियां थी। जिसके कारण बेहद कम उम्र में ही उनका निधन हो गया। कुछ विशेषज्ञ स्वामी विवेकानंद के निधन का कारण उनके दिमाग के नस का फटना या दिल का दौरा बताते हैं।

स्वामी विवेकानंद के जीवन से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

[स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय]: स्वामी विवेकानंद एक महापुरुष। स्वामी विवेकानंद एक ऐसी महान हस्ती थे, जिन्होंने अपने प्रेरणादायक विचारों और उच्च विचारों से लोगों को बहुत प्रेरणा दिया करते थे। स्वामी विवेकानंद ने अपने अल्प जीवन काल में ही मानव समाज के लिए प्रेरणादायक व्यक्ति बन गए हैं। वह युवाओं के लिए एक प्रेरणा के रूप में है। स्वामी विवेकानंद का मानना था आज युवा देश का वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य भी है। स्वामी विवेकानंद के जीवन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने व्यक्तित्व को कैसे खास बनाना चाहिए।

अपने जीवन को न केवल सफल बनाना होता है बल्कि हमें अपने जीवन को सफल के साथ-साथ सार्थक भी बनाना चाहिए। स्वामी विवेकानंद अपने जीवन में सभी युवाओं को उसके लक्ष्य से परिचित कराते हैं और बताते हैं, कि हम कैसे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। स्वामी विवेकानंद के जीवन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सदैव अपने देश के प्रति निष्ठा की भावना रखनी चाहिए। भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद अपने जीवन में यह शिक्षा देते हैं की एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के प्रति हमेशा ही प्यार का भाव रखना चाहिए। कभी भी समझ में किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। स्वामी विवेकानंद के जीवन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने जीवन में सदा सामाजिक बुराइयों से दूर होकर सदा दूसरों की सहायता करनी चाहिए। स्वामी विवेकानंद अपने जीवन में सीखते हैं कि सभी लोगों को सभी धर्म का ज्ञान होना चाहिए। अपने धर्म को भी नहीं भूलना चाहिए अपने कर्तव्यों को सदा सच्चे मन से पूरा करना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद के जीवन से हमें आत्मनिर्भर निडर और सही का समर्थन और अपनी बातों पर विश्वास रखने की शिक्षा मिलती है। स्वामी विवेकानंद बताते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में अपने ही किया कर्मों के कारण पछताते हैं क्योंकि हमें जो कुछ भी अपने जीवन में करना है जो कुछ भी पाना है हम उन चीजों पर ध्यान नहीं देते हैं। और जो चीज योग्य नहीं होती है। हम उन चीजों पर ध्यान देते हैं। इसलिए हम अपने लक्ष्य के पास होते हुए भी अपने लक्ष्य से बहुत दूर हो जाते हैं। इसलिए हमें स्वामी विवेकानंद के जीवन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने कर्तव्यों, लक्ष्य और अपने धर्म को कभी नहीं भूलना चाहिए।

Frequently Asked Questions

स्वामी विवेकानंद का जन्म कब हुआ था?

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 ई० को हुआ था।

Swami Vivekanand ka janm kahan hua tha?

कोलकाता (पश्चिम बंगाल में)

स्वामी विवेकानंद के गुरु का नाम?

स्वामी रामकृष्ण परमहंस

Swami Vivekanand ke Guru kaun the?

Swami Ramkrishna Paramhans

Swami Vivekanand ke bachpan ka naam kya tha?

Narendra Nath Datt

स्वामी विवेकानंद का जन्म कब और कहां हुआ था?

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 ई० को मकर संक्रांति के दिन कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में हुआ था।

स्वामी विवेकानंद की पत्नी का नाम?

स्वामी विवेकानंद ने शादी नहीं की थी। इसलिए इनकी कोई पत्नी है ही नहीं।

स्वामी विवेकानंद किस जाति के थे?

कायस्थ जाति के थे।

मोटिवेशनल स्वामी विवेकानंद कोट्स?

उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।

 इस तरह की जीवन परिचय या और सभी जानकारी के लिए Suchna Kendra से जुड़े रहे।

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