मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण?

नमस्कार दोस्तों, जैसा कि आप सभी को पता हैं की हमारा भारत एक त्योहारों का देश है । हमारे भारत में त्योहारों का बहुत महत्व हैं , इसलिए यहां सभी त्योहार बहुत ही हर्षोउल्लास से मनाया जाता हैं। इन्ही सब त्योहारों में से ही एक त्योहार है मकर संक्रांति का त्योहार, जो की अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार साल का पहला त्योहार होता है।

तो आज मैं आप सभी को अपने इस आर्टिकल में को बताऊंगा कि मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है, मकर संक्रांति कब मनाया जाता है? इसके वैज्ञानिक और धार्मिक कारण क्या है? मकर संक्रांति का महत्व क्या हैं, और मकर संक्रांति से संबधित सभी जानकारी आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

Table of Contents

मकर संक्रांति की संक्षिप्त में जानकारी

कब मनाई जाती है?पौष मास के शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि को
क्यों मनाई जाती है?सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के कारण
वेज्ञानिक कारणलगातार 6 महीनों बाद सूर्य की उत्तर दिशा में
गमन करने के कारण।
धार्मिक कारणसूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश के कारण।
कहा मनाया जाता है?भारत के साथ – साथ अन्य देशों में
मकर संक्रांति को और क्या कहा जाता है?फसलों का त्योहार
मकर संक्रांति पर किसकी पूजा की जाती है?सूर्य देव की
सूर्य देव का मंत्रॐ सूर्यायः नमः
सूर्य देव का बीज मंत्रॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।
सूर्य देव को क्या चढ़ाना चाहिए?तिल, गुड़, खिचड़ी
बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को किस नाम से जाता है?खिचड़ी पर्व और तिला संक्रांत
नेपाल में मकर संक्रांति को किस नाम से जानते है?माघी संक्रांति, सूर्योत्तरायण
मकर संक्रांति का महत्वइस दिन गंगा स्नान और दान पुण्य का विशेष महत्त्व है।
मकर संक्रांति पर क्या दान करना चाहिए?तिल का लड्डू, खिचड़ी, और जरूरत मंदो को कंबल, बर्तन, भोजन का दान करना शुभ माना जाता है।
मकर संक्रांति कितनी तारीख को मनाया जाता है?14 जनवरी या 15 जनवरी को।
2025 में मकर संक्रांति कब है?15 जनवरी
2025 मकर संक्रांति शुभ महुरतप्रातःकाल 7:15 से शाम के 5:46 तक (७:१५ से ५:४६ तक)
मकर संक्रांति कैसे मनाया जाता है?तिल के लड्डू खाकर और पतंगे उड़ा कर मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है।
मकर संक्रांति पर क्या करना चाहिए?पतंगें उड़ानी चाहिए, और तिल के बने लड्डू खाने चाहिए।
लोहड़ी कब मनाया जाता है?मकर संक्रांति से एक दिन पुर्व।
पोंगल कहा मनाया जाता है?केरल, आंध्रप्रदेश में
पोंगल कब मनाया जाता है?मकर संक्रांति को केरल में पोंगल कहते है। तमिलनाडू में पोंगल 4 दिनों तक मनाया जाता है।
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मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक कारण?

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है? मकर संक्रांति का त्योहार हमारे भारतवर्ष में बहुत हर्षोल्लास से मनाया जाता है। आइए जानते है कि मकर संक्रांति का त्योहार क्यों मनाया जाता है, और मकर संक्रांति के त्योहार का वैज्ञानिक कारण और महत्व क्या है? जनवरी माह के 14 या 15 तारीख को सूर्य उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते है। इसलिए इस दिन मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता हैं। मकर संक्रांति का त्योहार भारत और नेपाल में भिन्न रूपो में मनाया जाता है। तमिनालनादडू में इसे पोंगल, कर्नाटक , आंध्रप्रदेश में इसे संक्रांति और बिहार और झारखंड के कुछ कुछ जिलों में इसे ” तिला संक्रांत ” के नाम से जाना जाता है।

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इन सभी राज्यों में ये त्योहार पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है । कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन स्वर्ग का दरवाजा खुल जाता है। इसलिए इस दिन किया गया दान पुण्य अन्य दिनों में किए गए दान पुण्य से अधिक फलदाई होता हैं। मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करना , सूर्य भगवान को तिल का भोग लगाना और सूर्य भगवान की उपासना करने का बहुत महत्व हैं। मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी का बहुत महत्व हैं, और आज के दिन पतंग उड़ानें का भी रिवाज हैं। मकर संक्रांति के दिन कई जगहों पर दही चूड़ा खाने का भी रिवाज हैं।

मकर संक्रांति मनाने का धार्मिक कारण के साथ साथ एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक कारण भी हैं। वैज्ञानिक तौर पर इसका मुख्य कारण पृथ्वी का निरंतर 6 महीनों के समय अवधि के उपरांत सूर्य दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की और गमन करना है। पौष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सूर्य की उत्तरायण की दिशा प्रारंभ हो जाती है। इसलिए इस त्योहार को कई जगह पर उत्तरायण भी कहते हैं।
ऐसा कहा जाता है, कि इस दिन से अच्छे दिन की शुरूवात होने लगती हैं। मकर संक्रांति के दिन से सूर्य के उत्तरायण हो जाने से प्रकृति में बदलाव शुरू हो जाता हैं ।

सूर्य के उत्तरायण में गमन करने से पूर्व सूर्य की दिशा दक्षिणायन में रहती है, और दक्षिणायन में मानसून , शरद ऋतू , और शर्दी शामिल है। इसलिए जब सूर्य दक्षिण दिशा से उत्तर दशा की और गमन करता है, तो , ठंड के कारण सिकुड़ते लोगों को वसंत ऋतु से राहत मिलती आरंभ हो जाती हैं। क्योंकि उत्तरायण का समय वसंत , सर्दी , और गर्मी के मौसम का समय होते हैं। मकर संक्रांति के दिन से लोगो के अंदर एक अलग प्रकार की उर्जा देखने को मिलती हैं, और लोगो को सर्दियों से राहत मिलती हैं।

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता हैं धार्मिक कारण?

हिंदू धर्म में माह को दो पक्षों में बाटा गया है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। और वर्षो को भी दो अयनों में बाटा गया है। उत्तरायण और दक्षिणायन। और अगर दोनो को मिला दिया जाय तोह एक वर्ष पूरा हो जाता हैं। सूर्य जब अपने किसी एक ग्रह से दूसरे ग्रह में प्रवेश करता है। तो ज्योतिषों के अनुसार उसे संक्रांति कहते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति का त्योहार हर साल पौष माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि में मनाया जाता है।

पौष मास में जिस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। उसी दिन मकर संक्रांति का त्योहार ( पर्व ) मनाया जाता हैं। एक संक्रांति से दुसरी संक्रांति तक का समय सौरमास कहलाता हैं l वर्तमान शताब्दी में ये त्योहार (पर्व ) जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है। इस दिन को देवताओं का दिन भी कहा जाता है।
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर उनके सिरों को मंदार पर्वत में दबा कर युद्ध समाप्ति कि घोसना की थीं। इसलिए मकर संक्रांति के दिन को बुराइयों और नकारात्मकता के अंत का भी दिन माना जाता हैं।

मकर संक्रांति का त्योहार कहां मनाया जाता है?

मकर संक्रांति एक ऐसा त्योहार है। जो पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता हैं। ये पर्व भारत के साथ ही अन्य देशों में भी मनाया जाता है।मकर संक्रांति का त्योहार उत्तर भारत, बिहार, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, केरल आदि और भी बहुत से जगहों पर बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। उत्तराखंड और बिहार में इस त्योहार को मकर संक्रांति और खिचड़ी और गुजरात में उत्तरायण, पंजाब ने लोहड़ी , उत्तराखंड में उत्तरायणी और केरल में पोंगल के नाम से जाना जाता है। इन सभी जगहों पर ये त्योहर बहुत ही हरसों उल्लास के साथ मनाया जाता हैं।

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

मकर संक्रांति के विभिन्न प्रकार

मकर संक्रांति एक ऐसा त्योहार है, जो भारत मे,और भारत के अलावे भी कई देशों में मनाया जाता है। सभी जगह इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है, और सभी जगह के लोगो का इस त्योहार को मनाने का अपना अलग अलग तौर तरीके है। इसी के साथ ही सभी जगहों की अपनी एक अलग मान्यता है परंपराएं है। तो आइए देखते है। ये त्योहार भारत के अंदर किन किन राज्यों में मनाया जाता है, और उन राज्यों में मकर संक्रांति को किस नाम से जानते है, और इस त्योहार में उनकी परंपराए क्या है।

विभिन्न नाम भारत के राज्यो में:

  • उत्तरप्रदेश , बिहार और झारखंड – खिचड़ी और तिला संक्रांत
  • पंजाब और हरियाणा – लोहड़ी और माघी
  • पश्चिम बंगाल – पौष संक्रांति
  • तमिलनाडु ( केरल , आंध्र प्रदेश) – तराई पोंगल , उझवर तिरुनल
  • गुजरात और राजस्थान – उत्तरायण , पतंग महोत्सव
  • असम – भोगाली बिहू
  • महाराष्ट्र और गोवा – माघी संक्रांति और हल्दी कुमकुम
  • उत्तराखंड – घुघुतिया त्योहार

भारत के और भी अन्य राज्यों में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है। जैसे- छत्तीसगढ़, उड़ीसा, तेलंगाना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, सिक्किम आदि।

कैसे मनाया जाता है मकर संक्रांति का त्योहर?

[मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है?]: जैसा की आप सभी को बखूबी पता है, कि मकर संक्रांति का त्योहार भारत के कई राज्यों में बहुत धूम धाम से मनाया जाता है। तो आइए जानते है। मकर संक्रांति का त्योहार कैसे मनाया जाता है?

  • बिहार और झारखंड: सबसे पहले अगर हम बात कर बिहार और झारखंड की तो बिहार और झारखंड में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है। यहां पर मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से गंगा स्नान करने और दान पुण्य करने का विशेष महत्व है। यहां सभी लोग गंगा स्नान कर के उड़द की दाल, तिल, चावल, गुड़, ऊनी कपड़े का दान करते हैं, और सभी के घरों में दही चूड़ा और तिल की बनाई मिठाई खाई जाती हैं, और पतंगे उड़ने की भी परंपरा है। बिहार और झारखंड में रात के समय शुद्ध घी में बनी उड़द की दल की खिचड़ी खाने की विशेष परंपरा है। बिहार और झारखंड में सभी लोग मकर संक्रांति ( खिचड़ी पर्व ) को अपने परिवार के साथ मिलकर पूरे धूम धाम से मनाते हैं।
मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण
  • उत्तर प्रदेश: उसके बाद अगर हम बात करें। उत्तर प्रदेश की तो उत्तर प्रदेश में भी मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से जाना जाता हैं। उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को दान का भी पर्व कहा जाता है। उत्तर प्रदेश में गंगा स्नान के बाद दान पुण्य की परंपरा है। उत्तर प्रदेश में इस दिन आसमान में हर जगह रंग बिरंगी पतंगे उड़ती हुई देखने को मिलती हैं।
  • पंजाब और हरियाणा: अब आगर बात करे। पंजाब और हरियाणा की तो पंजाब और हरियाणा की तो पंजाब और हरियाणा मकर संक्रांति को लोहड़ी के नाम से जाना जाता है। पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी का त्योहार मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व मनाया जाता है। इस दिन सभी लोग लकड़ियों को इक्कठा कर लोहड़ी बनाते है, और आग जलाते है, और तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी, मूंगफली की अग्नि में आहुति देते हुवे नव विवाहित जोड़ा अपने सुखी व्यवाहित जीवन की प्रार्थना करते है। भांगड़ा और गिद्दा कर लोहड़ी का त्योहार पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं।
  • पश्चिम बंगाल: अब बात करते है पश्चिम बंगाल की तो पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति पे गंगासागर पर एक बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। यहां इस पर्व पर गंगा स्नान के बाद तिल दान की प्रथा हैं। कहा जता है इसी दिन मां यशोदा ने श्री कृष्ण की प्राप्ति के लिए व्रत रखा था। इस दिन मां गंगा भागीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुवे गंगा सागर में जा मिली थीं। यही वजह है की इस दिन गंगा सागर पर भारी भीड़ होती हैं।
  • असम में इसे माघ बिहू और भौकाली बिहू के नाम से जाना जाता है।
  • तमिलनाडु ( केरल और आंध्र प्रदेश): यहां इस पर्व को चार दिनों तक मनाया जाता है। तमिलनाडु में इस पर्व को पोंगल कहते हैं। पहले दिन को भोगी–पोंगल कहते हैं, दूसरे दिन को सूर्य-पोंगल कहते हैं, और तीसरा दिन मट्ट–पोंगल के नाम से जाना जाता है, और पोंगल का चौथा दिन कन्या–पोंगल के नाम से जाना जाता है। यहां दिनों के अनुसार पूजा अर्चना की जाती है।
  • राजस्थान: राजस्थान में मकर संक्रांति के दिन यहां की बहुएं अपनी सास को मिठाइयां और फल देकर उनसे आशीर्वाद लेती है, और इसके अलावा वहां 14 सुहाग की वस्तुओं को दान करने का अलग ही महत्व बताया गया है। यहां पर पतंगे उड़ने की भी खूब परंपरा है।
  • महाराष्ट्र: मकर संक्रांति के दिन गुल नमक हलवे को बांटने की प्रथा है। साथ ही लोग जरूरतमंदों को दान भी देते हैं।और इस दिन महाराष्ट्र के पूरन पोली खाने की भी परंपरा है।
  • उत्तराखंड: उत्तराखंड में मकर संक्रांति को अलग-अलग नाम से जाना जाता है। कुमाऊं में इसे घुघुती कहते हैं। वही गढ़वाल के ढ़वाल में इसे खिचड़ी संक्रांत के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड मे सभी लोग घुघुतिया के दिन अपनी सुबह की शुरुआत स्नान करने से करते हैं। उत्तराखंड के सभी घरों में सभी महिलाएं अपने रसोड़ों की अच्छी तरह से मिट्टी से लिपाई करती है, और पूरे घर की सफाई करती है। उसके बाद सभी महिलाएं एवं सभी पुरुष अपने परिवार के साथ मिलकर अपने देवी देवताओं की पूजा करते हैं, और फिर पूजा करने के बाद सभी महिलाएं भोजन में घुघुतिया बनती है। घुघुतिया को आटे से बनाया जाता है। इसे अलग-अलग आकृतियों के माध्यम से बनाया जाता है, और फिर घर के सभी छोटे बच्चों के हाथ से काग अर्थात कौवे को घुघुतिया खिलाया जाता है, और इसी प्रकार उत्तराखंड के सभी लोग मकर संक्रांति अर्थात घुघुतिया का त्योहार पूरे हर्षो उल्लास के साथ अपने परिवार के साथ मिलकर मनाते है।

भारत के बाहर की मकर संक्रांति

मकर संक्रांति का त्योहार भारत के अलावे और भी बहुत सारे देशों में मनाया जाता है। जैसे कि नेपाल , बांग्लादेश , म्यांमार , श्रीलंका, थाईलैंड आदि।

भारत के बाहर मकर संक्रांति के रूप और नाम:

  • नेपाल में मकर संक्रांति को सूर्यौतरायण या माघ की संक्रांति या खिचड़ी संक्रांति के नाम से जानते हैं।
  • बांग्लादेश में मकर संक्रांति को पौष संक्रांति के नाम से जानते हैं।
  • म्यांमार में मकर संक्रांति को थींयान नाम से जानते हैं।
  • थाईलैंड में मकर संक्रांति को सोंगकरन नाम से जानते हैं।

नेपाल में मकर संक्रांति कैसे मनाया जाता है?

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

नेपाल में बहुत सारे पर बहुत अलग-अलग तरीकों से अलग-अलग रीति-रिवाज से मनाया जाता है। नेपाल में मकर संक्रांति को मांगे संक्रांति सूर्य उत्तरायण और थारू समुदाय में मांगी कहा जाता है। मकर संक्रांति के दिन नेपाल के सरकार सार्वजनिक अवकाश का ऐलान करते हैं। नेपाल में मकर संक्रांति के दिन सार्वजनिक छुट्टी मनाई जाती है। नेपाल के थारू समुदाय में इस पर्व का बहुत ज्यादा महत्व है।

इस दिन सभी किसान इंद्र देव और सूर्य देव की पूजा – अर्चना करते हैं, और उनसे अपने अच्छे फसल के लिए धन्यवाद करते हैं, और आने वाले अच्छे फसल की प्रार्थना करते हैं। नेपाल में मकर संक्रांति के दिन अनेक तीर्थ स्थल पर लोग स्नान करने जाते हैं, और मकर संक्रांति के दिन नेपाल में दान पुण्य का भी महत्व है। मकर संक्रांति के दिन वहां पर सभी लोग तेल, घी, शर्करा और कंदमूल, खाकर इस त्यौहार को धूमधाम से अपने परिवार के साथ मनाते हैं। तीर्थस्थलों में रारू धाम (देवघाट ) व त्रिवेणी मेला वहां सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं।

मकर संक्रांति से जुड़ी पौराणिक कहानी

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

[मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है?]: ये कहानी सूर्य देव और शनि देव अर्थात पिता और पुत्र के मिलन से जुड़ी हैं। श्रीमद् भगवद्गीता और देवी पुराण के अनुसार सूर्य देव की दो पत्नियां थीं। छाया और संध्या । शनि देव छाया के पुत्र थें, और यमराज संध्या के पुत्र थें । एक बार शनि देव सूर्य देव से इस बात पर क्रोधित हो गए की वो उनमें और यमराज में भेदभाव करते है, और क्रोधवस वो अपनी माता छाया को लेकर सूर्य देव के घर से निकल गए।

जाते जाते छाया ने सूर्य देव को श्राफ दिया, कि उन्हें कुष्ठ रोग हो जाए, और दुर्भाग्य वस उनका श्राफ सिद्ध भी हो गया। जिसके कारण सूर्य देवता कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गए। कुष्ठ रोग के कारण वे बहुत दुःखी और बहुत पीड़ा में थें। उनकी ये स्थिति उनके दूसरे पुत्र यमराज से देखी नहीं गई, और इसलिए यमराज ने अपने पिता को इस कष्ट से मुक्त करने के लिए ऐक खठिन तपस्या की, और उनकी ये तपस्या सफल हो गई, और सूर्य देवता कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए।

परंतु सूर्य देव अपनें पुत्र शनि से बहुत ज्यादा नाराज थें, और बहुत ज्यादा क्रोधित थें, और क्रोध में आकर सूर्य देव ने शनि की राशि कुंभ यानी उनके घर अर्थात उनके कुंभ को जला दिया। शनि देव का घर यानी उनका कुंभ जल जाने पर शनि देव और उनकी माता छाया का जीवन कष्टमय हो गया, और उनके हालात बहुत खराब हो गए, और फिर यमराज से उनके कष्ट देखे नहीं गए, और इसलिए उन्होने सूर्य देवता को बहुत समझाया और यमराज के इतने समझाने पर तब जाकर सूर्य देवता का क्रोध शांत हुवा। क्रोध शांत होने के बाद सूर्य देव अपने पुत्र शनि और अपनी पत्नि से मिलने शनि देव के घर कुंभ में गए।

जो की पूरी तरह जल चुका था। सब कुछ जल जाने के कारण शनि देव के घर में एक मात्र तिल का तेल (तिल) ही बचा था। इसलिए शनि देव ने अपने पिता का स्वागत तिल से किया। जो सूर्य देवता की अति प्रिय वस्तु थीं। पुत्र के स्वागत से सूर्य देवता अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया की जब भी सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करेगें। जो की शनि देव का दूसरा घर है। तब उनका घर को धन – धान से भर जाएगा, और उनके घर में सुख समृद्धि आएगी।

ऐसा हुआ भी उस दिन से सूर्य देव और शनि देवता के बीच सब कुछ ठीक हो गया, और पिता और पुत्र की मिलन हो गई। और इसलिए उस दिन से ही तिल सूर्य देवता के साथ ही शनि देवता का भी प्रिय हो गया। और वो दिन मकर संक्रांति का ही दिन था। इसलिए शनि देव ने ये घोषणा कि, की जो भी व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन सूर्य देवता की पूजा करेगा, और तिल का सेवन तथा तिल का दान करेगा। उस व्यक्ति को शनि के कष्टों से मुक्ति मिलेंगी।

राई बाई की कहानी मकर संक्रांति

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

[मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है?]: मकर संक्रांति पर राई और श्री कृष्ण की कहानी का विशेष महत्व है। तो आइए जानते है श्री कृष्ण और राई की कहानी। जिंदगी में मनुष्य हजारों पाप करते हैं, और मैं उनकी राई राई का हिसाब रखता हूं। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं जो भी मनुष्य मेरी राई की कथा सुनता है। उसपर मेरी कृपा बनी रहती है। तो आइए हम आपको बताते हैं। भगवान कृष्ण और राई की कथा।


एक गांव में एक सेठ और सेठानी रहते थे। उनके तीन बेटे थे, और एक कन्या थी। उनकी कन्या का नाम राई था। राई अक्सर अपनी सहेलियों के साथ खेला करती और गोबर लेने जाती और आपस में बातें किया करती थीं। एक बार राई की किसी सहेली ने उससे कहा कि उसके पिता दूसरे गांव उसका विवाह खोजने जा रहे हैं। इस पर राई ने उन सभी से कहा तुम लोग जिससे चाहो मेरा विवाह करा सकते हो। परंतु मै विवाह भगवान कृष्ण के साथ ही करूंगी। वह अकसर अपनी सहेलियों से ये बात बोला करती थीं।

एक बार भगवान कृष्ण और उधो जी भेष बदलकर उस गांव में आए, और उस राई की बात सुनी, और उनसे प्रेरित होकर उसके पीछे-पीछे उसके घर चले गए, और उसके घर जाने के बाद श्री कृष्ण ने राई के पिता से कहा तुम्हारी बेटी के लिए वर लेकर आए है। राई के पिता ने श्री कृष्ण का रूप देखकर अपनी पुत्री राई का विवाह श्री कृष्ण से करा देते है। श्री कृष्णा 15 दिनों तक राई के घर में रहते हैं, और 15 दिनों के बाद वह वहां से यह कह कर चले जाते हैं। कि, वो राई को लेने अब पूरे गाजे बाजे के साथ आएंगे, और राई को गाजे बाजे के साथ लेकर जाएंगे।

परंतु श्री कृष्णा अपने धाम में 16000 रानियां के साथ रहते थे, और इसी कारण वस श्री कृष्ण राई को भूल जाते है। उधर राई का भगवान श्री कृष्ण की राह देखते-देखते 15 20 साल बीत चुके थे। राई प्रतिदिन भगवान श्री कृष्ण की राह देखा करती थी। उनके वापस न आने के कारण वो प्रतिदिन रोया करती थीं। परंतु प्रभु नहीं आए। इसी प्रकार श्री कृष्ण की राह देखते-देखते 40 वर्ष बीत चुके, और राई की आधी से ज्यादि जिंदगी श्री कृष्ण की राह देखते निकल गई थी। राई का बुढ़ापा आ गया था। राई के सिर के बाल सफेद हो गए। दांत गिरने लगे चेहरे पर झुर्रियां दिखाई पड़ने लगी

साथ ही राय के भाई भतीजे भी बड़े हो चुके थे। एक दिन राई ने अपने भाई से कहा भैया मुझे गंगा स्नान करना है। मुझे अपने सारे पाप धोने हैं। फिर राई का भाई उसे गंगा स्नान कराने लेकर के जाता है। वहां जाने के बाद राई का भाई पंडित जी से पिंडदान करने को कहता है। पंडित जी ने तांबे का कलश तैयार करके कृष्ण नाम से पिंडदान किया। कृष्ण के नाम का पिंडदान करवा कर कलश को राई के हाथ में दे दिया गया, और कहा इसे गंगा जी में बहा दो।

जब राई ने कलश को गंगा जी में बहाया तो कलश खिलखिला कर हंसने लगा, और बैकुंठ जाकर भगवान के सीने में प्रहार किया। फिर उसे देखकर भगवान श्री कृष्ण को अपने भूल का एहसास हुआ। फिर तुरंत ही भगवान श्री कृष्णा नंगे पैर दौड़ते हुए मृत्यु लोक में राई के पास आ गए, और फिर संपूर्ण गांव वाले ने राई को खूब सारी बधाइयां दी। राई ने जब अपने पति को अपने समकक्ष देखा तो वह बेहद प्रसन्न हो उठी। भगवान श्री कृष्ण को अपनी भूल का एहसास हुआ ऑल भगवान श्री कृष्ण ने राई से कहा मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई थी।

श्री कृष्ण ने पहली बार राई को स्पर्श किया और भगवान श्री कृष्ण के स्पर्श करते हीं। राई का पूरा शरीर दिव्य हो गया। जिसे देखकर भगवान श्री कृष्णा बोले हे राई आज से मकर संक्रांति के दिन से तुम्हारा लेखा जोखा हर धर्म में रहेगा, और जो कोई भी राई की कथा कहेगा और सुनेगा और मकर संक्रांति एक दिवस पर एक कटोरी राई भरकर जो कोइ भी मेरे मंदिर में दान करेगा वह मेरे धाम को प्राप्त होगा।

इस प्रकार जो भी मनुष्य भगवान श्री कृष्ण और राई की कथा कहता है या सुनता है या हुंकार भरता है, और जो कोई भी मकर संक्रांति के अवसर पर एक कटोरी राई भरकर मेरे मंदिर में दान करेगा, तो उसे भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

।। जय श्री कृष्ण।।

मकर संक्रांति पर खिचड़ी का विशेष महत्व

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

[मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है?]: मकर संक्रांति के त्योहार में खिचड़ी बनाने और खिचड़ी दान करने के पीछे बाबा गोरखनाथ की एक प्रसिद्ध कथा है। ऐसा कहा जाता है। जब खिलजी ने आक्रमण किया था। उस वक्त चारों तरफ हाहाकार मच गया था। युद्ध की वजह से नाथ योगियों को भोजन बनाने का समय तक नही मिल पाता था। लगातार भोजन की कमी से वह कमजोर होते जा रहे थें। नाथ योगियों की उस दशा को बाबा गोरखनाथ नहीं देख सके, और उन्होंने लोगो से दाल चावल और सब्जी को एक साथ मिलाकर पकाने की सलाह दी।

बाबा गोरखनाथ की सलाह सभी नाथ योगियों के बड़े काम आई। दाल चावल और सब्जी एक साथ मिलाकर बहुत कम समय में ही भोजन बन के तैयार हो जाया करता था। इसके बाद बाबा गोरखनाथ ने इस पाकेअंबको खिचड़ी का नाम दिया। खिलजी से युद्ध समाप्त हो जाने के बाद बाबा गोरखनाथ और योगियों ने मकर संक्रांति के दिन उत्सव मनाया और उस दिन लोगो को खिचड़ी बाटी। उसी दिन से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बाटी और बनाने की प्रथा को शुरूवात की गई।

मकर संक्रांति पर पतंगे क्यों उड़ाई जाती है धर्मिक और वैज्ञानिक कारण?

मकर संक्रांति पर कई जगहों जैसे गुजरात, राजेस्थान, समेत और भी कई जगह पतंग उड़ने की परंपरा है। गुजरात में इसे पतंग महोत्सव के नाम से भी मनाया जाता है। मकर संक्रांति के अवसर पर बाजारों में हर जगह पतंगे देखने को मिलते है। एक तरह अगर तिल, गुड़, मूंगफली की भरमार होती हैं। तो दूसरी तरफ रंग बिरंगी कई तरहों किं पतंगे देखने को मिलती है।

मकर संक्रांति पर पतंग उड़ने का धार्मिक और वेज्ञानिक दोनों ही मान्यताएं है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के अवसर पर सर्व प्रथम भागवान श्री राम ने सर्व प्रथम पतंग उड़ा कर इस परंपरा की शुरुवात की थीं। श्री राम के द्वारा उड़ाई गई पतन इन्द्रलोक में चलीं गई थीं। इसके बाद से ही अब तक इस परंपरा को निभाया जा रहा है, और आने वाले समय में भी ये परंपरा बनी रहेगी।

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण


वैज्ञानिक तौर पर देखे तो पतंग उड़ानें से मनुष्य का शरीर स्वस्थ रहता है। पतंग उड़ाना दिल और दिमाग दोनों के लिए बहुत फायदेमंद है। इसी दिन से भगवान सूर्य के किरणों का तेज बढ़ने लगता है। सूर्य की किरणे हमारे हड्डियों और रक्त के लिए बहुत लाभदायक है। इनके और भी कई लाभ है। ये शीत से पैदा होने वाले रोगों के लिए फायदेमंद है।

पतंगबाजी के दौरान पूरे दिन सूर्य की किरणें हमारे शरीर से टकराती है, और इससे शरीर स्वस्थ रहता है। इस दिन सूर्य का उत्तरायन होने की वजह से अत्यधिक मात्रा में विटामिन डी (Vitamin D) पाई जाती है। इस दिन सूर्य की किरणे सीधे व्यक्ति के शरीर पे पड़ती है। जिससे कई शारीरिक समस्याओं से बचाव होता है।

मकर संक्रांति कृषि संबंध

[मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है?]: मकर संक्रांति और कृषि के संबंध की बात करे। तो मकर संक्रांति को किसानों के लिए सुग्गी या फसल उत्सव है। बहुत सारे राज्यों में मकर संक्रांति का त्योहर कृषि पर आधारित है। मकर संक्रांति पर सभी किसान इंद्र देव और सूर्य देव को अपने अच्छे फसल के लिए धन्यवाद करते है, और उनसे प्रार्थना करते है। कि, वो अपनी अनुकम्पा सदैव सब पर बनाए रखे। मकर संक्रांति से रबी फसल की कटाई की समाप्ति होती है, और खरीफ फसल की बुनाई होती है। इसलिए मकर संक्रांति को फसलों का त्योहार भी कहा जाता है।

मकर संक्रांति और आयुर्वेद का संबंध

मकर संक्रांति और आयुर्वेद का एक बहुत बड़ा संबंध है। शीत ऋतु के मौसम के कारण लोग ठंड से सिकुड़े रहते है, और जब मकर संक्रांति पर सभी लोग खिचड़ी, तिल, और गुड़ का सेवन करते है। तो इससे हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। तिल हमारे शरीर के लिए काफी लाभदायक होता है। इसमें विटामीन B6 पाया जाता है। कैल्शियम, मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते है। जो की हमारे शरीर के हड्डियों को मजबूत बनाता है।

दिल से जुड़ी बीमारियों को ठीक करने में आपकी मदद करता है, और हमारे मस्तिष्क के लिए बहुत लाभदायक होता है। उसके साथ ही गुड़ हमारे शरीर को गर्म करता है, और हमारे शरीर ने हीमोग्लोबिन की स्तर को बढ़ाता है। जिससे आयरन की कमी दूर हो जाती है। इसके साथ ही खिचड़ी एक सदा भोजन और एक बेहद ही हल्का भोजन है। इसे खाने से किसी भी मनुष्य को कोई समस्या नही होगी, और मनुष्य एक स्वस्थ जीवन जिएगा। इसी प्रकार मकर संक्रांति आयुर्वेद से सम्बन्धित है।

मकर संक्रांति का वैज्ञानिक सम्बंध

मकर संक्रांति का वैज्ञानिक रूप से भी एक महत्वपूर्ण संबंध है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य निरंतर 6 महीने के बाद उत्तरी दिशा में गमन करता है, और बीते 6 महीने में जब सूर्य दक्षिण दिशा में रहता है, तो दक्षिण दिशा में रहने के कारण उसे समय का मौसम वसंत ऋतु और मानसून और सर्दी का मौसम रहता है। जिसके कारण लोग ठंड से सिकुड़ रहते हैं, और कहीं ना कहीं सूर्य से जो प्राप्त एक निरंतर ऊर्जा होती है। वो हमारे शरीर को नही मिल पाती है।

परंतु जब सूर्य निरंतर 6 महीने के बाद उत्तरी दिशा में गमन करता है।अर्थात उत्तरायण होता है। तो, लोगों को ठंड से राहत मिलती है, और लोगों को मकर संक्रांति के दिन भरपूर मात्रा में विटामिन डी प्राप्त होता है। जिससे लोगों को ठंड में काफी राहत मिलती है, और विटामिन डी हमारे शरीर के लिए काफी फायदेमंद होती है। हमारी हड्डियां मजबूत होती है और हमें एक अलग ही प्रकार की फुर्ती महसूस होती है।

केरल में पोंगल का क्या महत्व है, और क्यों मनाया जाता है?

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

[मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है?]: हर साल जब सूर्य उत्तरायन होता है। तो दक्षिण भारत के कई राज्य जैसे केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश में पोंगल का त्योहर मनाया जाता है। जिसे उत्तर भारत में मकर संक्रांति या लोहड़ी के नाम से जाना जाता हैं। पोंगल का त्योहर हर वर्ष 14 और 16 जनवरी के बीच में मनाया जाता हैं। ये त्योहार शर्दियो के मौशम में पड़ता है। इस दिन गंगा स्नान करने का और दान पुण्य करने का विशेष महत्व है। कहा जाता हैं जब नई फसल हो जाती है। तो किसान अपने खुशी को जाहिर करने के लिए पोंगल का त्योहर मनाते है।

आइए जानते है पोंगल का महत्व और पोंगल का इतिहास ,तमिल में पोंगल का अर्थ होता है। उफान और विप्लव, इस दिन चावल, शक्कर, और दूध से खीर बनाकर भोग तैयार किया जाता हैं, और सूर्य देव को चढ़ाया जाता है। इस भोग को पोंगल के नाम से जाना जाता हैं, और पोंगल को प्रशाद के रूप में सभी को बाटा जता है। दक्षिण भारत में केरल सहित तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश राज्य में पोंगल से ही नई साल की शुरूवात मानते हैं, और पोंगल को धूम धाम से मनाते हैं।

यहां के लोग पोंगल परअपने घरों को फूलों, आम के पत्तों, और रंगोली बना कर नए साल की शुरूवात करते हैं। उत्तर भारत की तरह ही यहां के भी लोग एक दूसरे को पोंगल के दिन सबको नए साल की शुभकामनाएं देते हैं, और पोंगल और मिठाइयां बाटते हैं। दक्षिण भारत में पोंगल का पर्व तीन दिन तक चलता हैं। पहले दिन भगवान इंद्र की पूजा की जाती है, और अच्छी फसल के लिए उनका धन्यवाद किया जाता हैं। पोंगल के दूसरे दिन सूर्य देवता की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन एक विशेष प्रकार की खीर बनाई जाती है, और इसी खीर से सूर्य देव की पूजा होती है।

बाद में इस खीर को प्रशाद के रूप में सभी के बीच में बांट दिया जाता हैं। पोंगल के तीसरे दिन किसान अपने पशुओं की पूजा करते हैं। जिसे मट्टू पोंगल के नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मट्टू पोंगल भगवान शिव का बैल था। जिसे भगवान शिव ने किसानों के लिए पृथ्वी पर भेजा था। इसलिए पोंगल के तीसरे दूं किसान अपने पशुओं को अच्छे से नहला कर उनके सिंघो में तेल लगाकर उनकी पूजा करते हैं। पोंगल के त्योहर को सभी आपस में मिल जुलकर मनाते है। इस प्रकार पोंगल भाईचारो का भी प्रतिक हैं।

पंजाब में लोहड़ी का क्या महत्व है? | क्यों मनाया जता है लोहड़ी का त्योहार?

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

हर वर्ष पूरे उत्तर भारत में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी का त्योहार पूरे उत्सव के साथ मनाया जाता हैं। लेकिन इस त्योहार की घूम सबसे ज्यादा पंजाब और हरियाणा में देखने को मिलती हैं। पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी का त्योहार बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता हैं, क्योंकि यह पंजाबियों का खास त्योहार है। लोहड़ी के दिन अग्नि में तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली चढ़ाई जाती है। इस दिन नव विवाहित जोड़ा अग्नि में आहुति देते हुवे चक्कर लगाते हैं, और अपनी सुखी व्यवाहित जीवन की प्रार्थना करते है ।

अब आइए आपको बताते है। लोहड़ी क्यों मनाई जाती है? लोहड़ी पारंपरिक तौर पर फसल की बुआई और फसल की कटाई से जुड़ा एक खास त्योहर है। इस मौके पर पंजाब में नए फसल की पूजा करने की परंपरा हैं। लोहड़ी के दिन सभी पंजाबी लड़के आग के पास पास भांगड़े और सभी लड़कियां गिद्दा करते हुवे नजर आते है। सभी लोग लोहड़ी का त्योहार अपने परिवार और अपने मित्रों के साथ मिलकर पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं।

इस दिन तिल , गुड़ , गजक , रेवड़ी , मूंगफली का खास महत्व हैं। पहले के समय में लोग लोहड़ी का त्योहर मनाने के लिए घर-घर से लकड़ियां इकट्ठा करते थें। लोहड़ी जलाने के लिए परंतु अब सभी लोग लकड़ियां खरीदने के लिए पैसे दे दिए जाते है, और शाम को किसी चौराहे या घर के आगे लोहड़ी जलाई जाती है, और पूजा की जाती है। लोहड़ी के दिन घर-घर जाकर दुल्ला भट्टी और अन्य तरह की गीत गाने की परंपरा है।

हालांकि आज के समय में कम ही लोग घर घर जाकर गीत गाया करते है। लोहड़ी के दिन सभी बच्चे घर घर जाकर लोहड़ी मांगा करते है, और किसी भी घर से बच्चे को खाली हाथ नहीं जाने दिया जता है। इसलिए सभी बच्चों को तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी, और मूंगफली दी जाती है। कुछ इसी प्रकार पंजाब और हरियाणा में अपने परिवार और अपने मित्रों के साथ मिलकर पूरे हर्षोल्लास के साथ लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है।

मकर संक्रांति धर्मराज की कहानी

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

[मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है]: एक समय की बात है। जब पृथ्वी लोक पर बब्रुवाहन नामक एक राजा हुआ करते थे। उनका राज्य बड़ा ही सुखद एवं समृद्ध था, एवं राजा भी बड़े दयालु थे। राज्य में एक हरिदास नाम का ब्राह्मण भी निवास करता था। हरिदास एक तपस्वी थे। उनकी पत्नी का नाम गुड़वती था। जो की बेहद ही सुशील संस्कारी, धर्मवती, एवं पतिव्रता स्त्री थी। गुड़वती ने अपने जीवन में सभी देवी देवताओं की उपासना की, और सभी प्रकार के व्रत किए, एवं दान धर्म भी किया करती थी। इसके अलावा अतिथि सेवा को भी वे अपना धर्म मानती थी। ऐसे ही हंसी खुशी ईश्वर की उपासना करते हुए वह वृद्ध हो गई।

फिर समय आया और गुड़वती की मृत्यु हो गई। तो यम के दूत उसे अपने साथ यमपूरी ले गए। यमलोक में सुंदर सिंहासन पर धर्मराज विराजमान थे, और उनके ही पास में चित्रगुप्त भी बैठे थे। चित्रगुप्त के पास सभी प्राणियों के पाप पुण्य का लेखा-जोखा होता है। चित्रगुप्त प्रभु को प्राणियों का लेखा जोखा सुना रहे थे। तभी वहां यम दूत गुड़वती को लेकर पहुंचे। गुड़वती उन्हें देखकर थोड़ी भयभीत हो गई। और अपना मुंह नीचे कर खड़ी हो गई। चित्रगुप्त ने गुड़वती का लेखा जोखा निकाला और धर्मराज जी को बताया।

धर्मराज जी ने गुड़वती का पूरा ब्योरा देखा और बहुत प्रश्न हुए। परन्तु उनके मुख मंडल पर थोड़ी उदासी भी छाई थी। यह देखकर गुड़वती ने पूछा हे प्रभु मैंने तो सारे सत्कर्म ही किए हैं। फिर भी आपके मुख पर यह उदासी छाई हुई है। इसका क्या कारण है? कृपा करके मुझे बताइए। प्रभु मुझसे क्या भूल हुई है। तब धर्मराज जी ने कहा हे देवी तुमने सभी देवी देवताओं के व्रत किए उपासना की है। परंतु तुमने मेरे नाम से कोई भी पूजा पाठ या व्रत नहीं किया है। धर्मराज जी ने कहा तुमने मेरे नाम से कोई भी दान धर्म नहीं किया है।

धर्मराज की यह बात सुनते ही गुड़वती धर्मराज जी से क्षमा याचना करने लगी, और कहने लगी है। प्रभु मुझे आपकी उपासना के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। मैं नहीं जानती की कि आपकी उपासना कैसे की जाती है? कृपा करके मुझे वह उपाय बताइ। जिससे कोई भी मनुष्य आपकी पूजा अर्चना और आपकी उपासना कर सके, और सभी मनुष्य आपकी कृपा के पात्र बन सके। मैं आपकी मुख से आपकी भक्ति का मार्ग सुनना चाहती हूं, और मेरी यह इच्छा है की मै मृत्यु लोक पर वापस जाकर आपकी भक्ति करू, और सभी लोगों को इसके बारे में बताऊं।

धर्मराज जी ने उसकी विनती सुन कर बताया। जिस दिन सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश करते हैं। यानी जिस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। वह दिन मकर संक्रांति का दिन होता है, और मकर संक्रांति के दिन से ही मेरी पूजा आरंभ करनी चाहिए। और इस दिन से लेकर पूरे 1 वर्ष तक मेरी पूजा करते हुए कथा सुन्नी चाहिए, और एक दिन भी पूजा या कथा नहीं छुटनी चाहिए। साथ ही पूजा करने वाले व्यक्ति को इस धर्म के 10 नियमों का पालन करना चाहिए।

  1. संतुष्ट रहना एवं धीरज रखना।
  2. अपने मन को वश में रखना, और सभी को क्षमा करना।
  3. चोरी या अन्य दुष्कर्म नहीं करना।
  4. मानसिक एवं शारीरिक शुद्धि एवं पर पुरुष एवं पर स्त्री से दूर रहना।
  5. अपने इंद्रियों को वस में रखना।
  6. बुरे विचारों को अपने मन में ना लाना अर्थात अपने बुद्धि को पवित्र रखना।
  7. पूजा पाठ एवं दान पुण्य इत्यादि करना।
  8. व्रत करना एवं व्रत की कथा सुनना।
  9. सत्य बोलना एवं सभी से अच्छा वह सच्चा व्यवहार करना।
  10. क्रोध न करना।

धर्म के इन सभी 10 नियमों का पालन करते हुए पूरे 1 वर्ष तक मेरी कथा नियम से सुने, दान पुण्य व परोपकार्य करें। एवं अगले मकर संक्रांति पर इस व्रत का उद्यापन करे। अपने सामर्थ्य से मेरी एक मूर्ति बनाकर, विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा कर हवन पूजन करें। एवं साथ ही चित्रगुप्त की भी पूजा करें। एवं काले तिल के लड्डू का भोग लगाए, और ब्राह्मणों को भोजन करवाए। वह बांस की टोकरी में पांच शेर अनाज का दान करें।

इसके अलावे गरीबों या जरूरतमंदों को गद्दा, तकिया, कंबल, लोटा, वस्त्र आदि दान करें। हो सके तो गौ दान भी करें। धर्मराज से पूरी कथा सुनकर गुड़वती ने पुनः र्धर्मराज से प्रार्थना की और कहां है प्रभु मुझे पुनः मृत्यु लोक मे जाने दीजिए। जिससे मैं आपके व्रत को करू और इस व्रत का प्रचार भी लोगो से कर सकू। इसपर यमराज जी ने अपनी सहमति दे दी।

धरती लोक पर गुड़वाती पुनः जीवित हो गई, और उसके परिजन बहुत प्रसन्न हुवे। गुड़वती ने धर्मराज से हुई बात चीत को अपने पति से बताया और कहा हम ये व्रत आवश्य करेंगे और धर्म के नियमों का पालन भी करेंगे। मकर संक्रांति आते ही गुड़वती और उसके पति ने व्रत की शुरूवात कर दी और एक वर्ष पश्चात् इसका उद्यापन किया। इस व्रत के प्रभाव से उनपर धर्मराज जी की कृपा हुई, और उन्हे मोक्ष की प्राप्ति हुई।

।। जय हो धर्मराज जी की ।।

मकर संक्रांति विशेष इन हिंदी

जब सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करते है तो मकर संक्रांति ( उत्तरायण ) का त्योहर मनाया जाता है। मकर संक्रांति की विशेष बात ये है, कि इस दिन स्वर्ग का दरवाजा खुल जाता है, और इसी दिन से देवताओं का आगमन शुरू हो जाता है। इसलिए मकर संक्रांति को देवताओ का भी दिन कहा जाता है। मकर संक्रांति का त्योहार किसानों के लिए बहुत खास दिन दिन होता हैं। इस दिन को फसलों का त्योहार भी कहते है, क्योंकि मकर संक्रांति से ही रबी फसल को कटाई होकर खरीफ फसल की बुआई शुरू हो जाती है।

मकर संक्रांति पर स्बाही किसान विशेष रूप से भगवान इंद्र और सूर्य देव की पूजा करते है, और उन्हे अच्छे फसल के लिए धन्यवाद प्रकट करते है, और आने वाले अच्छे फसल के लिए प्रार्थना करते है। महाभारत के अनुसार ऐसा कहा जाता है की मकर संक्रांति का दिन बहुत ही शुभ होता है। इसी दिन को भीष्म पितामह ने अपने देहत्याग के लिए चुना था। श्री कृष्ण कहते है शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि को जो भी व्यक्ति अपना देह त्यागता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इन्ही सब कारणों के कारण मकर संक्रांति का त्योहार विशेष माना जाता है।

मकर संक्रांति महत्त्व

हिंदू पुराण के अनुसार ऐसा कहा जाता है, कि मकर संक्रांति के दिन स्वर्ग का दरवाजा खुल जाता है। इसलिए इस दिन को देवताओं का दिन भी कहा जाता है। भीष्म पितामह ने अपने देह त्याग के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चयन किया था।

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करने का विशेष महत्व है, और दान पुण्य का भी विशेष महत्व है। मकर संक्रांति के दिन को देवताओं का दिन भी कहा जाता है, इसलिए इस दिन किया गया दान पुण्य और दिनों के दान पुण्य से अलग होता है।

मकर संक्रांति की पूजा विधी | मकर संक्रांति की पूजा कैसे करे?

[मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है?]: हिंदू धर्म में पूजा पाठ का एक विशेष महत्व है हिंदू धर्म चाहे कोई भी पर्व त्यौहार हो सभी पर त्यौहार में पूजा करने की अलग-अलग विधियां होती है। अलग-अलग मुहूर्त होता है। तो मकर संक्रांति की पूजा विधि का भी मुहूर्त है, और इसकी भी पूजा करने की एक विधि है। तो लिए हम जानते हैं मकर संक्रांति के दिन हमें किस प्रकार पूजा अर्चना करनी चाहिए। मकर संक्रांति पर विशेष रूप से सूर्य देव की पूजा की जाती है। तो सूर्य देव की पूजा करने के लिए कुछ विधि है।

इसके बारे में हम अभी बात करेंगे। मकर संक्रांति के दिन अगर संभव हो तो आप किसी भी पवित्र नदी या या गंगा स्नान कर ले, और अगर ऐसा संभव न हो। तो आप अपने घर में ही शुद्ध पानी में गंगाजल मिलकर अच्छे से स्नान कर के खुद को शुद्ध कर ले। उसके पश्चात आपको एक तांबे के लोटे में शुद्ध गंगाजल भर के उसमें अक्षत, चंदन, गुड, काला तिल और एक लाल पुष्प को रखकर प्रातः काल में ही सूर्य देव को अर्घ्य दे।

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

उसके पश्चात सूर्य देव का मंत्र-ओम सूर्याय नमः या सूर्य देव का बीज मंत्र ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः का दोनों हाथों को जोड़कर काम से कम 108 बार इन मंत्रों का जप करें। इस दिन सूर्य देव को तिल गुड़ और खिचड़ी का भोग लगाए और हाथ जोडकर उनसे प्रार्थना करे और अंत में सूर्य देव की आरती करें और पूजा का समापन करें।

मकर संक्रांति पर दान पुण्य का भी विशेष महत्त्व है इस दिन तिल, गुड़ और सभी जरूरतमंदो को कंबल, बर्तन, का दान करें, और ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उनसे आशीर्वाद ले। मकर संक्रांति के दिन ब्राह्मणों को सीधा ( दान ) करे। दान में चावल, दाल, आटा, आलू , तिल और गुड़ की बनी मिठाई, और कुछ पैसे जरूर दान में दे।

मकर संक्रांति पर 10 लाइन

मकर संक्रांति पर 10 लाइन इस प्रकार है।

  1. मकर संक्रांति का त्योहार भारत में 14 जनवरी या 15 जनवरी को मनाया जाता है।
  2. मकर संक्रांति का त्योहार पौष मास के शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि को सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश करने के कारण मनाया जाता है।
  3. मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान करना शुभ माना जाता है।
  4. मकर संक्रांति के अवसर पर लोग पतंगे उड़ाते हैं और तिल की बनी हुई लड्डू खाते हैं।
  5. मकर संक्रांति का त्यौहार अपने परिवारों के साथ मिलकर पूरे धूमधाम से मनाया जाता है ।
  6. मकर संक्रांति का त्योहार भारत के अलावा नेपाल में भी मनाया जाता है।
  7. मकर संक्रांति पर दान का बहुत बड़ा महत्व है। इस दिन बड़ी मात्रा में तिल और सभी जरूरतमंदों को को उनकी जरूरत के सामान जैसे कपड़े , बर्तन , भोजन , आदि का दान करना चाहिए।
  8. मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव को एक तांबे के लोटे में तिल अक्षत गुड और लाल फूल डालकर अर्घ्य देना चाहिए ,और उन्हें तिल के लड्डू और खिचड़ी का भोग लगाना चाहिए।
  9. मकर संक्रांति का त्योहार हमारे देश में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है।
  10. बिहार , झारखंड और उत्तर प्रदेश में इसे खिचड़ी या तिला संक्रांत कहते हैं।

मकर संक्रांति शायरी

  • चाहे भाई हो चाहे बहन चाहें दादा जो चाहे दादी
    चाहे अंकल हो चाहे आंटी आप सभी को मेरी तरफ से हैपी मकर संक्रांति।
  • तन में मस्ती मन में उमंग,
    देकर सबको अपनापन, गुड़ में जैसे मीठापन
    होकर साथ में उड़ाए पतंग, और भर दे आकाश में अपने रंग।
  • मंदिर की घंटी पूजा की थाली,
    नदी के किनारे सूरज की लाली,
    जिंदगी में आए खुशियों की हरियाली,
    आप सभी को हैप्पी मकर संक्रांति।

Frequently Asked Questions

मकर संक्रांति किस राज्य में मनाया जाता है?

मकर संक्रांति भारत के कई राज्यों में मनाया जाता है ।जैसे बिहार , झारखंड , उत्तर प्रदेश ,गुजरात , तमिलनाडु , असम ,पंजाब , हरियाणा , उत्तराखंड आदि

मकर संक्रांति कब है 2025 में ?

ज्योतिषों के अनुसार 2025 में मकर संक्रांति का त्योहार 15 जनवरी को मनाया जाएगा।

2025 में मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त कब से कब तक का है?

मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त15 जनवरी को प्रातः काल 7:15 से शाम के 5:46 तक का है।

मकर संक्रांति कब मनाई जाएगी?

मकर संक्रांति 15 जनवरी को है।

मकर संक्रांति 2025 तारीख और समय ?

मकर संक्रांति 2025 में 15 जनवरी को है और इसका शुभ समय प्रातः काल 7:15 मिनट से शाम के 5:46 तक है।

Why Makar Sankranti celebrated on 14 January?

पौष मास अर्थात जनवरी के 14 या 15 तारीख को सूर्य ध्रुव राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। अर्थात इस दिन सूर्य निरंतर 6 महीने के बाद दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर गमन करता है। अर्थात सूर्य उत्तरायण होता है। इसलिए इस दिन मकर संक्रांति का त्यौहार मनाया जाता है।

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